शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

** जी प्याज जी **

आया बयान  ,
शिखर से !
समुचित भण्डारण के अभाव  में  सडा   / 
कार्यवाही   होगी  /
चढ़ा   मूल्य   आसमान   पर , 
केशर   की  तरह  / ,सूंघें  या  खाएं  ?
अमूल्य  दर्शन  !,
बजट अनियंत्रित ,  सरकार  की तरह  ,
खरीदें या  देखकर ही  हो लें  संतुष्ट  /
दुष्ट  मन  नहीं  मानता  ,
दास  तृष्णा का , स्वाद  का  /
ख़रीदा   चार  नग ,
पारदर्शी थैले  में ले आया  ,
ऊँची बांह कर    /
देख  ले   जमाना   !
हम  भी  खरीद  सकते हैं  प्याज  / 
नेताओं, पूंजीपतियों, अफसरों    की तरह /
दुर्भाग्य !
रास्ते  में  मिले  उचक्के ,
मारा  झपट्टा   ,
फटा  थैला ,
दो  ले  गये  , दो गिरे जमीन  पर  /
उठाया दुखी मन  ! क्या  ब्यवस्था है  /
लाया घर , 'तरन ' बोली ------
एक दे  आओ,   लंगर   के लिए   /
बचा   एक रसोई  के लिए   / 
आँखों   से  आंसू  निकल  रहे  हैं  ,
उसके भी  !,
मेरे भी ! 
वह    काट  रही  है ,
मैं  कोस रहा हूँ  /
ब्यवस्था को  ,महंगायी  को   /
प्याज   जी   आना  मेरे   देश  ----------  /

                                                उदय वीर सिंह 
                                                 २३/१२/२०१० ,






2 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अब तो बाजारीकरण के साथ ही प्याजीकरण भी हो गया है ...सटीक और सार्थक लेखन

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

चढ़ा मूल्य आसमान पर ,
केशर की तरह ....सूंघें या खाएं ?
बिल्कुल सही कहा है आपने...
इस मंहगाई ने
लोगों की तोड़ डाली कमर
चलें तो चलें कैसे
अब तो सीधे होने का भी डर !