मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

**माँ ही जाने पीर **

ना बीता ,
ना बिता सका , जितना चाहा   /
जो बीता , तेरे सानिध्य   में  ,गोंद  में  ,
पुनः पाने की लालसा ------
मैं जानता हूँ , पूरी नहीं हो सकती ,
पीछे  नहीं लौट सकता  समय  /
फिर  भी स्मृतियों में ढूँढता हूँ  ,
तुम्हें        /
अध्ययन  ,बना  निर्वासन ,
कुछ बनने की आस  ,प्रयास  ,
तब  तक  छूटा  साथ   ------
      विस्मृत नहीं होते वो पल  ,
 खिली धूप में , गोंद में रखे  सिर ,निकालती  जुएँ  /
सुनाती  साखियाँ रातों    में ,
गाती  लोरी ---[साडी आँखा  विचों  सोया पुत मेरा-----------]
सुलाने का  विफल  प्रयास  /
      देखे स्वप्न, बड़ा बनाने का  ,निष्चल  निर्देश -------
आंसू नहीं  /क्रोध नहीं  /विवाद नहीं  /--अरदास करनी !
सब्र ,संयम ,साहस की मांगती  दुआएं ,
जो लगीं मुझे   /
       छिपाकर देना  --पिन्नियां ,पैसे ,बुने स्वेटर ,जुराबें,
 जो अब  नहीं मिलते  /
पाल्य  पूछते हैं ---
      पापा कैसी थीं ,आपकी माँ  ?
बताता हूँ ---तेरी  माँ  जैसी   /
सभी   मांएं,    माँ जैसी   /
--------  कहता  मुझे कोई  नहीं अब ------
वीर-----  वीर  -बिना खाए नहीं सोना  ,
नाराज होंगे --बाबा जी  /  
जीवन  गतिमान  है   --चलता  आया    ,
स्मृतियाँ   स्थिर  हैं ,वहीँ   अतीत  में  ,
क्या करूँ   विस्मृत  नहीं   होतीं   -------

                                             उदय वीर सिंह
                                              २७/१२/२०१०

1 टिप्पणी:

वन्दना ने कहा…

सभी मायें एक जैसी ही तो होती हैं…………सुन्दर अभिव्यक्ति।