शनिवार, 26 मार्च 2011

***विशामृत***

सतत जीवन  पथ पर ,सामाजिक ,नैतिक दायित्वों से, मूल्यों से ,किंचित स्वार्थ ,लिप्सा ,वासना  के वसीभूत 
भौतिक सुख की प्राप्ति हेतु  अहंकार  विद्वेष एवं घृणा में , झूठ  ,आडम्बर ,षड़यंत्र  का गामी बन ,कितना छलता है ,अपनों को ,
समाज को , मूल्यों को ,यहाँ तक की स्वयं को  / अधिनायक  बनने का कुत्सित प्रयास अंत में घृणित ,लांछित  पीड़ा का
 कारन  तो बनता ही है ,नहीं दे पाता, दिए मानसिक , दैहिक वेदना का मोल  जिसके  कारन मिला  / लौटता  है  हारे जुआरी
की तरह , जिसके पास  न पाने को है , न खोने  को , सिवा पश्च्याताप  के / यह पद्यांश किसी व्यक्ति विशेष ,समाज ,या समूह 
का प्रतिनिधित्व  या लक्षित  नहीं करता  / यदि किसी  की भावना  को ठेस लगती हो  , तो हम  माफ़ी चाहते हैं   /ये मेरे निजी  
बिचार हैं ,जो किसी ,घटना ,दुर्घटना  या संयोग से ताल्लुक नहीं रखते  / आभार ----]

          कितना अंतर है -----
जख्म      देने     में ,  मरहम    लगाने     में          
तामीर करना  आशियाना , उसको जलाने में ,
फूलों से खेलने में ,    गुलशन    सजाने     में,
जीवन अपराध लगता है, फरेबी    ज़माने   में ---

जाता रहा डांस-बार , जिम  जाने के  नाम  पर ,
   बेचता रहा नशा ,अफीम ,दवावों  के   नाम   पर  ,
      नाईट  क्लब  का सदस्य था ,जन सेवा का नाम था
        पीता    रहा   शराब  , सेहत     के       नाम       पर   ---

कंधे  से   झूलता   बैग , सादा    लिबास    था ,
   बेचता रहा  ब्लू -फिल्म ,किताबों के नाम पर ,
    कहता  कसम   खुदा    की , ऐतबार      कीजिये ,
       मधुशाला में रह रहा था ,इबादत खाना के नाम पर -----

कहा   बंगलौर , गया   शिमला ,  मसूरी को ,
   छलता रहा कैसे ज़माने को,शराफत के नाम पर ,
     दंगों  में रहा शामिल ,सनद मरीज-ए-हस्पताल की  ,
      बे -  गुनाही   मांगता  है , सौं  गीता  के   नाम     पर -----

खुला शिक्षालय कागजों  में ,सर्व -शिक्षा का भाव ले ,
    मिलती  रही इमदाद लाखों की ,शिक्षा  के  नाम  पर ,
      शिक्षण -प्रशिक्षण  ,कार्य -  शाला  का  बहाना    था ,
          सजाये  वासना   का   मंडप , सेमिनारों  के  नाम  पर ----

जीता है परमार्थ ,सोता है धर्मार्थ ,आदर्श इतना ,
    वेश्यालय चला रहा था , अनाथालय के नाम पर  ,
       मजबूर थे  ,जरुरतमंद थे , बेरोजगार   हांथों   का ,
          करता    रहा    शोषण , रोजगारी    के   नाम     पर -----

बेचता रहा फर्जी डिग्रियां ,प्रमाण -पत्र भावनाओं से खेलकर ,
    खेलता  रहा ,जिंदगी   से , युवा  - शक्ति  के   नाम      पर ,
       बांधे पट्टियां आँखों पर ,सहते  रहे  भावनावों के नाम पर
          आज   पीठ   पर  हैं   छाले ,   हिफाजत   के   नाम     पर  ---

पहले  शर्म  थी  , हया   थी  ,बदजुबानी  गुनाह   था ,
   वो  घूमता  रहा  उन्मुक्त ,  जमानत   के   नाम    पर  ,
     अफ्शोश ! खबर  बाद  में  हमको ,इल्म्कार जमाना था
       हैरान  हूँ   पढ़कर  वारंट ,  गिरफ्तारी   के    नाम    पर -----
  
                                                                              उदय  वीर सिंह .
    




4 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

शत प्रतिशत सत्य समाज कितना छलता है सारगर्भित रचना , आभार

ZEAL ने कहा…

.

कितना अंतर है -----
जख्म देने में , मरहम लगाने में
तामीर करना आशियाना , उसको जलाने में ,
फूलों से खेलने में , गुलशन सजाने में,
जीवन अपराध लगता है, फरेबी ज़माने में ---

आपकी रचनाओं में जीवन के अनुभवों की खुशबू है । बहुत कुछ सीख रही हूँ आपसे ।

.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बेचता रहा फर्जी डिग्रियां ,
प्रमाण -पत्र भावनाओं से खेलकर ,
खेलता रहा ,जिंदगी से ,
युवा - शक्ति के नाम पर ,
बांधे पट्टियां आँखों पर ,
सहते रहे भावनावों के नाम पर आज पीठ पर हैं छाले , हिफाजत के नाम पर ---


अंतस को झकझोरती हुई
यथार्थपरक रचना.... हार्दिक बधाई।

सतीश सक्सेना ने कहा…

सही कहा आपने ...शुभकामनायें !!