रविवार, 3 अप्रैल 2011

***सांध्य- बाला ***

धूप   ,  दीप     नैवेद्य  ,  पुष्पों    से  ,
सजते   थे  थाल ,संध्या  वंदन  की ..
सुवासित   होता  शिवाला , प्रान्गड़  ,
प्रफुल्लित   होता  ,मन  वातावरण   /
खुले   वातायन  से-
प्राण -वायु  का   प्रवेश   ,गाते  पंछी   ,
बजता  मृदंग ,जुड़े   हाँथ  श्रधालुओं    के ,
गूंजता    मधुर  स्वर ,  आरती   गायन  का  ....
भगवद  चरण  सुलभ  था 
दर्शनार्थ  /
प्रभु  चरणों  की  सेविका  ,हांथों  में  आरती- थाल
पुत्री ,  माला   बंदनीय  थी   आदरणीय  थी  ,श्रधा  थी ,
प्रभु  चरणों  के   समीप  थी   ,
वितरित    करती  प्रसाद , संध्या  का , शुभ  का  ,
मनोभाव  लिए   /
ग्रहण करते श्रधा से  ,सभी  
नतमस्तक  होते , करते आभार   ----
****
   ----अपने  शहर लौटा हूँ  अरसे   बाद ,
जाग्रत हुयी  इच्छा ,संध्या-बंदन की ,दर्शन की शिवाले की ,
चला  आया   /..
विस्मय , विद्रूप साँझ ! अविस्वसनीय  !
वीरान शिवाला ,अस्तित्वहीनता की  ओर ,
बगल में खड़ी भव्य  अट्टालिका ,
शायद  कोई   ध्यान  केंद्र  है !
जिसमें  प्रवेश  ,चयन  सर्वाधिकार  सुरक्षित  है  /
वैभव  बिखेरता   परिसर   ,इन्द्रलोक  सा  ,
ऊँची  प्राचीर  ,
झिलमिल  प्रकिर्नित  सतरंगा  मद्धिम  प्रकाश ,
भय  प्रदर्शित  करते  ,सुरक्षा  प्रहरी  ,
सुगम  नहीं   निहारना  भी  ,
छुपी  आँखें   कमरे  की ,सन्नद्ध  प्रतिपल   /
 अपराध -बोध  लिए    पूछा  प्रहरी   से  -
महानुभाव   !
मणि  शंकर   व   माला , अब  कहाँ  रहते  ?
बोला  -
स्वागत  कक्ष  का  ध्यान  करो   /
पाया  समाधान -----
      सद्दगुरु  हरिद्वार  में  हैं    /
      आते  हैं   दर्शन देने   कभी   कभार  ,
      मल्लिका   मैडम   व्यस्त  हैं ,
      माननीयों  के  ध्यान  निर्देशन  में ,
      शांति  ,सन्मार्ग  की प्राप्ति  में  /
      अगले  नौ  महीनों   तक  प्रवेश   बंद  है    /
 यहाँ   कोई   माला   नहीं   रहती    ---
 मैंने  निहारा  टंगे  तैल  चित्र    पर   ,
 वही  माला !
 जो  अर्पित  करती --  माला  , सजाये  आरती  थाल,
        बाँटती  प्रसाद ,
        प्रभु  चरणों  में /
अब   मल्लिका  है   /
शिवाला -- अट्टालिका  है   /
प्यास  बुझाने   का  प्याऊ - वियर   बार  है
स्थल,  भजन   कीर्तन  का  -  डांस  बार  है
नम्रता  ,संस्कारों   की बाला  ,
छद्मवेशी  होटल  की
संचालिका  है    /----

                            उदय वीर सिंह
                             ०३/०४/२०११
                                          








5 टिप्‍पणियां:

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

वर्तमान दशा पर कटाक्ष करती महत्वपूर्ण कविता..

वन्दना ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (4-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

mridula pradhan ने कहा…

प्यास बुझाने का प्याऊ - वियर बार है
स्थल, भजन कीर्तन का - डांस बार है
नम्रता ,संस्कारों की बाला ,
छद्मवेशी होटल की
संचालिका है /----
bahut achchi, samyik visay par likhi hai aapne.....

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत खूब..परिवर्तन की आंधी में सब कुछ धरासायी होगया है..भावों और शब्दों का बहुत सुन्दर संयोजन...बहुत संवेदनशील रचना..

Sunil Kumar ने कहा…

प्यास बुझाने का प्याऊ - वियर बार है
स्थल, भजन कीर्तन का - डांस बार है
नम्रता ,संस्कारों की बाला ,
छद्मवेशी होटल की
संचालिका है /----
आज की सच्चाई को बयां करती हुई रचना ...