शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

**एटम-बम **

[प्रकृति    के    रहस्यों   से   अंजान कुछ  ज्ञांत  हुआ  तो  इश्वर  बनने  का  दर्प  आज  मौत  के  मुहाने  पर  ले   आया  है  / हम  सोच  बैठे  की  परमाणु-शक्ति   से  शत्रु  का  संघार करेंगे  ,जबकि   विकिरण  की  अदृश्य  आग  .जो  सरहद -बिहीन   है   फैलेगी   ,तो  जलाने वाले  व  जलने वाले   दोनों  ही  खाक  हो  जांएगे  . आओ  सोचें  क्यों  तुले  हैं  अनमोल  कृति    के  विनाश  पर ..... . ]
***           ***
मुक्त   नहीं   हो  खुदा नहीं हो ,
   ज्वालामुखी    उगाते      क्यों  ?
     सृष्टि    अनमोल   मिटाने   को ,
        एटम -   बम     बनाते    क्यों   ?

नादान  अभिमान  में क्यों भूला,
    परमाणु  -  अग्नि    ना   चेरी   है ,
       दबे    पांव ,    अदृश्य      मौत ,
          देने     से     पहले       तेरी     है   /

परी सी धरती , क्षितिज रुपहला ,
    खाक  में   इसे   मिलाते   क्यों  ?

फुक्कुसिमा      चेर्नोबायिल,
   सीने    के    जख्म   नमूना हैं
     हर महाद्वीप  में  धधक  रही लौ ,
       हर-   पल   सदमें   में  सफीना है  /

वर्चश्व  धर्म का ,मद का ,निज का ,
    जीवन   को   झुठलाते    क्यों   ?

कुंद   चेतना  जडवत होती ,
   मरुधर  बन गया विचार सृजन ,
      क्या  द्रवित  हुआ न  देख हृदय ,
       नागासाकी , हिरोशिमा  का  मंचन  ?,

हे सृष्टि के अनमोल देव !
    शोणित से प्यास बुझाते क्यों  ?

पुस्तें      उबर      नहीं      पाई ,
  प्रारब्ध ,वैधव्य , विकलांग  मिला ,
    नदियाँ क्या ,पयोधि भी निष्फल है,
      समन-हीन विकिरण का अभिशाप मिला   /

न पहचान  पराये अपने  की,
       उस    पनाह    में   जाते   क्यों  ?

संधि    न       कोई    रोक   सके ,
    न    रोक    सके    सरहद    कोई ,
     वाशिंगटन ,दिल्ली ,बीजिंग, माश्को
        मिट       जायेंगे        हर        कोई  /

मसले     तो     तेरे  -  मेरे   हैं
    सृष्टि    को   बाँझ    बनाते  क्यों  ?

न   मरा " मैं "  व   दर्प   अगर
    मर    जायेगा    इन्सान    यंहां  ,
     जिस वैभव  ,सामर्थ्य  पर   इतराते ,
        बन    जायेगा     शमशान       यहाँ   /

बसुधा  का  आँगन  सबका   है ,
     विष - बेल   उदय    लगाते  क्यों  ?


                                         उदय वीर सिंह .

                                        

  


                      







8 टिप्‍पणियां:

सतीश सक्सेना ने कहा…


मुक्त नहीं तुम खुदा नहीं हो ,
ज्वालामुखी उगाते क्यों ?
सृष्टि अमोल मिटाने को ,
तुम एटमबम बनाते क्यों ?

मूर्ख गर्व में भूल गया तू
शक्ति अपरिमित नहीं रुके
दवे पाँव, अद्रश्य मौत
हो, सबसे पहले तेरी है !

अरे मूर्खो जागो घर में
अपने आग लगाते क्यों
सुंदर धरती,क्षितिज रुपहला
ख़ाक में इसे मिलाते क्यों ?

यह गीत बहुत अच्छा लगा सो अपनी भाषा में आपके भाव कहे हैं आशा है नाराज़ नहीं होंगे ! शुभकामनायें भाई जी !

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (30.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

sm ने कहा…

beautiful thoughtful poem
every line says something
नादान अभिमान में क्यों भूला,
परमाणु - अग्नि ना चेरी है ,
दबे पांव , अदृश्य मौत ,
देने से पहले तेरी

ZEAL ने कहा…

सृष्टि अनमोल मिटाने को ,
एटम - बम बनाते क्यों ?


बहुत ही सार्थक प्रश्न । इन बमों का निर्माण ही एक व्यक्ति की destructive mentality को ज़ाहिर करता है।

.

Kunwar Kusumesh ने कहा…

You have raised valid questions.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

न तू मरेगा , न मैं मरूँगा
मर जायेगा इन्सान यंहां ,
जिस वैभव ,सामर्थ्य पर इतराते ,
बन जायेगा शमशान यहाँ ..

Sach kaha hai .. agar tarakki ki ye raftaar rahi to jaldi hi aisa hone waala hai ...

Dr Varsha Singh ने कहा…

परी सी धरती , क्षितिज रुपहला ,
खाक में इसे मिलते मिलाते क्यों ?

Wonderful post ....... Beautiful expression.

mahendra verma ने कहा…

कविता में बहुत सार्थक प्रश्न उठाए हैं आपने।
शुभकामनाएं।