शुक्रवार, 10 जून 2011

अनुबंध देश से

न करो बंदगी ,पर   खुदा  तो  नहीं ,
   न जलाओ  दिए, तो  बुझाओ  नहीं ,
    ये शिवाला है भारत, मयखाना  नहीं ,                  
      बनकर अमृत ,जहर तो पिलाओ  नहीं--

साफ रखना ह्रदय मैल धुल जायेंगे 
   गुनाहों   से    परदे    हटाने    चलो ,
     कुछ  लुटेरों  का दल  लुटता  है चमन ,
       खाक में  उनकीं  हस्ती   मिटाने  चलो --
  
जर्रे -जर्रे  में  भारत समाया  हुआ ,
    भूल से भी उंगलियाँ दिखाओ नहीं ---

सह लिया दर्द, कितना करोगे  सितम ,
  क्या   दीखती  नहीं  तुमको  दुश्वारियां ,
    देव - भूमि   तरसती   है ,  रोटी     नहीं ,
     क्या  जुदा   खून   से    तेरी     खुद्दारियां --

हौसला ,प्यार ,खिदमत ,की सौं खायी थी ,
    लोड़बन्दों  पर   गोली   चलाओ      नहीं --

बहनों  का सिंदूर ,माताओं  का लल्ला ,
   कलाई  की  राखी ,  बुढ़ापे   का   साया ,
     नौनिहालों की रोटी ,साजन का  कंगना ,
      न्योछावर किया, अपने भारत  को पाया --

वो लहू है रगों में ,वो दम  भी अभी ,
    गुनाहगारों   वतन  के   विसारो नहीं -

नव निर्माण की धुन मिटाओ नहीं ,
   आवाज    हक़   की   दबाओ     नहीं ,
      जानवर   भी   वफादार   होते     रहे ,
       दाग दामन पर माँ  की  लगाओ  नहीं --

हड्डियाँ  भी   बनी  हैं  उद्धारक  कभी ,
  उस  चलन के हैं वारिश ,भुलाओ  नहीं --
   ये जमीं,सज्जनों साधुओं,कर्मवीरों की है ,
     कदाचार    का      घर      बसाओ     नहीं --

                                      उदय वीर सिंह
.                                      १०/०६/२०११ 
     



14 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

बहनों का सिंदूर ,माताओं का लल्ला ,
कलाई की राखी , बुढ़ापे का साया ,
नौनिहालों की रोटी ,साजन का कंगना ,
न्योछावर किया, अपने भारत को पाया --
बहुत सुन्दर और सटीक पंक्तियाँ! सच्चाई को बड़े ही शानदार रूप से प्रस्तुत किया है आपने! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गयी!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-

http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (11.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

Sunil Kumar ने कहा…

आवाज हक़ की दबाओ नहीं , दूसरों का हक़ मारना ही इनकी आदत बन गयी है अच्छी रचना ,बधाई

ZEAL ने कहा…

मन को उद्वेलित करती , एक बहुत ही ओजमयी प्रस्तुति। धन्यवाद उदय जी।

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

हड्डियाँ भी बनी हैं उद्धारक कभी ,
उस चलन के हैं वारिश ,भुलाओ नहीं --
ये जमीं,सज्जनों साधुओं,कर्मवीरों की है ,
कदाचार का घर बसाओ नहीं -
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ!
दिल को छू गयी!

Kailash C Sharma ने कहा…

सह लिया दर्द, कितना करोगे सितम ,
क्या दीखती नहीं तुमको दुश्वारियां ,
देव - भूमि तरसती है , रोटी नहीं ,
क्या जुदा खून से तेरी खुद्दारियां --

... सार्थक सन्देश देती एक प्रेरक प्रस्तुति..आज की व्यवस्था पर बहुत सटीक और सशक्त टिप्पणी..बहुत सुन्दर..आभार

निवेदिता ने कहा…

सकारात्मक सार्थक सन्देश दिया है आपने ....... आभार !

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहनों का सिंदूर ,माताओं का लल्ला ,
कलाई की राखी , बुढ़ापे का साया ,
नौनिहालों की रोटी ,साजन का कंगना ,
न्योछावर किया, अपने भारत को पाया --
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ!
धन्यवाद उदय जी।

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया ..

संजय भास्कर ने कहा…

सार्थक सन्देश देती एक सुन्दर प्रस्तुति....

संजय भास्कर ने कहा…

आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं
http://sanjaybhaskar.blogspot.com/

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

दिल को छू लेने वाली रचना है

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

waah! waah! bahut khoob ji majaa aa gaya. badhai sweekar karen.

वाणी गीत ने कहा…

जनता को ऐसी ही जागरूकता की आवशयकता है ...
सार्थक सन्देश ...