बुधवार, 13 जुलाई 2011

**यश-गाथा **

क्यों पढ़ें तेरी यश-गाथा
  जिसमें प्रेम-सन्देश न हो
    यशगान मुझे  स्वीकार नहीं
      जिसमें   मेरा   देश  न   हो--

कहने का साहस  रखते हैं
   सुनने  की  भी   रीत यहाँ ,
     मिटने का बल न्याय -निहित ,
        अन्याय उन्मूलन की सीख यहाँ   -

जीवन की मर्यादा है तो ,
     मृत्यु  का  संज्ञान भी है  ,
      भक्ति भाव  संकल्प भी है तो ,
          रण   भूमि का ध्यान भी है--

निष्क्रिय हो वो ह्रदय पंक-मय ,
     भारत   प्रेम   अवशेष   न  हो -

वेद -पुराण  प्रतिष्ठित  हैं तो ,
   ग्रन्थ- साहिब को सम्मान भी है ,
      कुरान शरीफ ,बाईबल भी जाग्रत ,
         तो   बुद्ध, जैन   का   ज्ञान   भी है ---

 सूर ,कवीर ,तुलसी की ऑंखें ,
    बांचे    है     मानव     रचना ,
       सूफी   संत  ,फकीर    रसीले ,
          पी  लो  अमृत  चाहे  जितना  --

वह राह भी  है कितनी सूनी,
    जिस  पथ  में  दरवेश  न हों--


 जब रावण का प्रादुर्भाव हुआ ,
    तब   राम   यहाँ   पर  आते हैं  ,
      जब  छल - छद्म   आतंक   बढ़ा,
        तब   गीता ,  कृष्ण    सुनाते   हैं --

 युद्ध वरण हो धर्म हमारा ,
      जब  शांति- पथ अवशेष न हों  --

कितने आये चले गए युग ,
   न  गया  देश न प्यार  कभी ,
     बह रही निरन्तर गंगा -यमुना ,
       श्रधा थीं , नहीं  व्यापार     कभी --

अभिशप्त -मानस के दुराग्रही ,
      प्रवेश   न हो ,अभिषेक  न हो -


प्रतिमान   हमारे   ऊँचे   हैं ,
   स्वाभिमान  हमारा ऊँचा है ,
    बिगड़ी तो बना लेने का दम ,
      सदाचार    हमारा    ऊँचा   है --

जय -हिंद कहे अंतिम धड़कन ,
     सद्भाव   रचे   ,विद्वेष     न   हो --

                                  उदय वीर सिंह  
                                     13/07/2011                

9 टिप्‍पणियां:

Kailash C Sharma ने कहा…

जीवन की मर्यादा है तो ,
मृत्यु का संज्ञान भी है ,
भक्ति भाव संकल्प भी है तो ,
रण भूमि का ध्यान भी है--

...बहुत सुन्दर औए प्रेरक प्रस्तुति..आभार

रश्मि प्रभा... ने कहा…

जीवन की मर्यादा है तो ,
मृत्यु का संज्ञान भी है ,
भक्ति भाव संकल्प भी है तो ,
रण भूमि का ध्यान भी है--bahut hi badhiyaa

Rakesh Kumar ने कहा…

प्रतिमान हमारे ऊँचे हैं ,
स्वाभिमान हमारा ऊँचा है ,
बिगड़ी तो बना लेने का दम ,
सदाचार हमारा ऊँचा है --

जय -हिंद कहे अंतिम धड़कन ,
सद्भाव रचे ,विद्वेष न हो -

गदगद हो गया मन उदय जी.
आपकी सोच व उच्च भावनाओं को प्रणाम.
आपके आत्म-विश्वास को प्रणाम
आपके देश प्रेम को प्रणाम..

udaya veer singh ने कहा…

प्रिय, प्रबुद्ध- जनों आपके मुखर विचार मुझे भरोषा देते हैं ,कि मेरा लेखन सतत गतिमान रहे ,आपके हृदय से प्रस्फुटित सद्भाव ,मंजिल कि तलाश में चिराग बनते हैं , जो थोड़े ही होते हैं ,फिर भी अनमोल / जिन्हें सहेजना मेरा धर्म है ,सफलता के लिए ,उच्च आदर्शों के लिए सम्मान के लिए /हृदय से आभारी हैं आपके स्नेह .......के लिए /

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

प्रेरक रचना! यदा यदा हि ...

Deepak Saini ने कहा…

प्रेरक देशभक्ति रचना
आभार

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

क्यों पढ़ें तेरी यश-गाथा
जिसमें प्रेम-सन्देश न हो
यशगान मुझे स्वीकार नहीं
जिसमें मेरा देश न हो--

......
जीवन की मर्यादा है तो ,
मृत्यु का संज्ञान भी है ,
भक्ति भाव संकल्प भी है तो ,
रण भूमि का ध्यान भी है--

L a j w a a b.

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

रतिमान हमारे ऊँचे हैं ,
स्वाभिमान हमारा ऊँचा है ,
बिगड़ी तो बना लेने का दम ,
सदाचार हमारा ऊँचा है --

आस्था और विश्वास से ओतप्रोत सुन्दर रचना !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

शौर्य का संचार करती रचना!
आज इसी जागरण की आवश्यकता है!