गुरुवार, 27 अक्तूबर 2011

बे-पनाह


         
हम    दीवारों   में    हैं  ,तुम   कतारों    में ,
बस्ती गुनाहगारों की ,महफूज  बहारों  में -


जब     डरने   लगे  हैं कलम  के   सिपाही ,
खामोश      है      जिंदगी,      इशारों     में  -


अत्याचार का नशा  परवान है ,इस  कदर ,
कट     रहा    है   इन्सान,     बाज़ारों    में -


बिकते थे  इन्सान, वहसियों  के   राज में,
लौट आया है इतिहास,अबके ताजदारों में -


ये  देश  मेरा   भी  है , कहने   की   हसरत ,
जुबाँ   कैद    है ,  होठों    की     दरारों    में  -


बहना ही अच्छा है उदय,दरिया जो शीतल है ,
वरना , आग  ही आग फैली है, किनारों  में -


शर्मिंदा हैं ,न दे पाए तुम्हें सपनों का वतन ,
फर्क इतना है ,हम बाहर हैं ,तुम मजारों में -


                                        उदय वीर सिंह .
                                          २७/१०/2011

9 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

विवेक जी के मेरे सपने, शाक-आहारी रहो
ख़्वाब हो या कोई हकीकत, कौन हो तुम कुछ कहो
इश्क नचाये जिसको यारा, साथ उसको मत बहो
सरदार बोले उन्नयन पर, कष्ट बे-पनाह सहो |

आपकी उत्कृष्ट पोस्ट का लिंक है क्या ??
आइये --
फिर आ जाइए -
अपने विचारों से अवगत कराइए ||

शुक्रवार चर्चा - मंच
http://charchamanch.blogspot.com/

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर ग़जल है!
दीपावली, गोवर्धनपूजा और भातृदूज की शुभकामनाएँ!

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया ..

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपके पोस्ट पर पहली बार आया हूं । पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया देकर मेरा भी मनोवल बढाएं । धन्यवाद ।

रविकर ने कहा…

खुबसूरत प्रस्तुति ||
आभार महोदय |
शुभकामनायें ||

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह! वाह! वाह!

दिलबाग विर्क ने कहा…

खूबसूरत कलाम

Dr. Hardeep Sanshu ने कहा…

अत्याचार का नशा परवान है ,इस कदर ,
कट रहा है इन्सान,बाज़ारों में -

बहुत अच्छी गज़ल है ...
इतने गहरे भाव ..की बार पढ़ी मैंने तो ....
जब इन्सान ही हैवान बन जाए तो दुनिया का अंत समझो !
ऊँची सोच उडारी उदय वीर जी ....
हरदीप

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

बहना ही अच्छा है उदय,दरिया जो शीतल है ,
वरना , आग ही आग फैली है, किनारों में -

बहुत खूब ....