सोमवार, 7 नवंबर 2011

कुछ देख सकें ...

आँखों   में  स्वप्न  अधूरे हैं 
कुछ देख सकें तो   आ देखें --
उजड़े बाग़ बंजर सी  धरती ,
जो  सींच  सकें तो आ सींचें -


         शैल   छिपाए  शीतल   जल
            तो   अंतर्मन  में  ज्वाला भी ,
             गिरिवर सी बढती पीर हुयी ,
                दुश्वारी पयोधि की शाला  सी ,


अंतस   में   घोर   अँधेरा है ,
कुछ दीप जला कर आ देखें -


          देखी  है ज्वाला कानन   में  ,
            उदर की ज्वाला  कब देखी ,
              देखा यौवन, मद  बसंत सा ,
                पतझड़ की शाला कब देखी ,


खुले नयन पीड़ा से बोझिल ,
कुछ   पूछ   सकें   आ  पूछें -


         गठ्ठर सा,पूत पीठ पर बांधे,
            सिर    पर   बोझ   उठाई   है ,
             आधी  ढकी ,फटी   सी  धोती ,
               जीवन  की  आस  लगायी  है ,


किस पल उसका प्रारब्ध सजेगा ,
आ   बिरंची     से   अब     पूछें -


         कलम   के   हाथ   कटोरा है ,
           कूड़ेदान ,  घूर    में   रोजी  है
            बचपन,यौवन सब विसर गए ,
              संवेदन शून्य सवाल दो रोटी है  ,


वो   किस  देश के वासी हैं ,
यदि पूछ सकें तो आ पूछें -


           हाड़    कंपाती    रातों    में
             आसमान खुला वो सोते हैं ,
              पैबंद  लगे  बोरों  से  आवृत ,
                तन     भगवान   भरोषे    है ,


क्या वो भी हैं इन्सान जरा
आओ   मिलकर  हम सोचें -


           ख़ाली  हाथ   हैं  काम  नहीं ,
              दावानल     महंगाई     का ,
               भूखा  पेट  कुंठित   अंतर्मन
                 अभिशापित जीवन खायीं सा ,


बेवस ,मजबूर बिकती है बाला ,
क्या     है   हल    इसका    ढूंढें -


                             उदय वीर सिंह .
                              ०७/११/२०११




   


         






       

17 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत भाव ..

संजय भास्कर ने कहा…

गहन अनुभूतियों को शब्द मिले हैं!
बेहतरीन कविता उदय वीर सिंह बधाई

अनुपमा पाठक ने कहा…

अंतस में घोर अँधेरा है ,
कुछ दीप जला कर आ देखें -
सुन्दर!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना...बधाई स्वीकारें

नीरज

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! सूचनार्थ!

Kailash C Sharma ने कहा…

कलम के हाथ कटोरा है ,
कूड़ेदान , घूर में रोजी है
बचपन,यौवन सब विसर गए ,
संवेदन शून्य सवाल दो रोटी है ,

बहुत मर्मस्पर्शी...रचना के भाव अन्दर तक झकझोर देते हैं...बहुत सुंदर

Deepak Saini ने कहा…

अंतस में घोर अँधेरा है ,
कुछ दीप जला कर आ देखें -

बहुत खूब

अशोक बजाज ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना. साधुवाद .

Amrita Tanmay ने कहा…

शिल्प , भाव व अर्थ आदि समस्त दृष्टिकोण से अतिउत्तम रचना.जैसे दिनकर ,प्रसाद... को पढ़ा है. आपको बधाई.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ख़ाली हाथ हैं काम नहीं ,
दावानल महंगाई का ,
भूखा पेट कुंठित अंतर्मन
अभिशापित जीवन खायीं सा .....

बहुत खूब ... जीवन की सच्चाई को बेहतरीन शिल्प में बाँधा है आपने ...

amrendra "amar" ने कहा…

बहुत खूब... भावों की बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति.. ...........

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर वाह!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

खुबसूरत गीत...
सादर साधुवाद...

बेनामी ने कहा…

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