बुधवार, 14 दिसंबर 2011

अभिप्राय

जलाकर  भावनाओं  की  आग
कभी     रोटी     नहीं      बनती-
                 बेकार है सल्तनत ,तख्तो-ताज 
                 प्यार   बिन  जोड़ी  नहीं  बनती -

धृतराष्ट्र     का     अंधापन    सदा ,
महाभारत  को   जमीन    देता है ,
जब  गांधारी  भी  अंधी  बन  चले
दुर्योधन का स्वप्न हसीन होता है ,
 
                नजर-ए-आवाम  न बांध  पट्टियाँ,
                जम्हूरियत हीरा  है कौड़ी नहीं होती-

अफसोश   उनकी  मांग   में    सिंदूर
तेरी   मांग   में   कोरी    सियासत है -
गिला है अफसर - कर्मियों  से  तुम्हें
दलालों ,मुनाफाखोरों को हिफाजत है-

          ओ मिलों ,मलमल के ब्रांड अम्बेसडर
           कपास     के   बिन धोती नहीं बनती  --

सेवक  के चोले  में  चोर, पुलिस  पीछे ,
अब महा -चोर, आगे - पीछे है पुलिस-
कल  अकेला था ,अब   कानून     संग
कल तलाश में,आज सत्कार में पुलिस-

             लेकर   सुरक्षा,   तोड़ता  है  ,हर   कानून
             सामर्थ्यवान  के  लिए  बेडी  नहीं  बनती  -

                                                            उदय वीर सिंह




9 टिप्‍पणियां:

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut sundar atiuttam.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सार्थक चिंतन

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शासक का शासन अनुशासन।

anju(anu) choudhary ने कहा…

गहन विचारो से लिखी गई सार्थक अभिव्यक्ति

रविकर ने कहा…

आपकी इस सुन्दर प्रस्तुति पर हमारी बधाई ||

terahsatrah.blogspot.com

सागर ने कहा…

gahan vicharo ka sarthak abhipraaye.....

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति । मेरे मए पोस्ट नकेनवाद पर आप सादर आमंत्रित हैं । धन्यवाद |

musafir ने कहा…

सुंदर रचना, सामाजिक सरोकार रखती ये रचना, एक आम आदमी की ज़रूरतों को प्रस्तुत करती है.
आभार

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

अच्छी कविता भाई उदय जी |सत् श्री अकाल |