शनिवार, 24 दिसंबर 2011

प्रछन्न

खुदा    की   राह   में ,  खुद  नहीं  चलते ,
वफ़ा  की   राह    में   दिए   नहीं  जलते-


मेरे   गुनाह   से  पर्दा , जो  न  उठ  पाए ,
तो मतलब ये नहीं हम गुनाह नहीं करते-


पैमाना-ए-इश्क में ,इतना रस्क भर गया ,
ढलने  लगी  है  शाम ,पैमाने   नहीं ढलते-


पेश करते हैं गुलाबों को, गाफिल दिल से ,
कभी  साथ  लिए   वो , दिल  नहीं  चलते -


सुनाते हैं महफ़िलों में,जो गवारा नहीं उन्हें ,
दिल की अपनी बात जुबान से नहीं कहते -


खैरात  है  रब  की  उदय ,ईमान ले  जाओ ,
मकान -ए- दिल में ,  दरवाजे  नहीं  लगते-


रोशन   रहा  है  दर , फकीरों  की  शान से ,
मज़ार- ए - हुक्मरान ,रोशन   नहीं    होते -


                                                       उदय वीर सिंह  
                                                         24 /12 /2011 






10 टिप्‍पणियां:

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

मेरे गुनाह से पर्दा , जो न उठा पाए ,
तो मतलब ये नहीं हम गुनाह नहीं करते-

नमस्कार,
यदि उपरोक्त पकती में "उठा पाए" की जगह उठ पाए अधिक सार्थक है और रचना के गाम्भीर्य को कई गुणित बाधा देता है. पूरी कविता प्रभावशाली और मनन-मंथन की प्रेरणा देती है. बधाई हमेधा की तरह एक और खूबसूरत प्रस्तुति के लिए.

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

मेरे गुनाह से पर्दा , जो न उठा पाए ,
तो मतलब ये नहीं हम गुनाह नहीं करते-

नमस्कार,
यदि उपरोक्त पकती में "उठा पाए" की जगह उठ पाए अधिक सार्थक है और रचना के गाम्भीर्य को कई गुणित बाधा देता है. पूरी कविता प्रभावशाली और मनन-मंथन की प्रेरणा देती है. बधाई हमेधा की तरह एक और खूबसूरत प्रस्तुति के लिए.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दिखायी पड़ता नहीं, दिखाता सब कुछ है..

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवारीय चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर भी होगी। सूचनार्थ

udaya veer singh ने कहा…

आदरणीय डॉ . साहब सृजन परिमार्जन में सहयोग अविस्मरनीय रहेगा ,हृदय की गहराईयों से आपका धन्यवाद /

udaya veer singh ने कहा…

आदरणीय डॉ . साहब सृजन परिमार्जन में सहयोग अविस्मरनीय रहेगा ,हृदय की गहराईयों से आपका धन्यवाद /

dheerendra ने कहा…

उदय जी,..आपके पोस्ट पर पहली बार आया, आना सार्थक रहा प्रभावशाली सार्थक रचना के लिए
बहुत२ बधाई,....बेहतरीन पोस्ट....

मेरे नए पोस्ट के लिए--"काव्यान्जलि"--"बेटी और पेड़"--में click करे

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

बहुत बढ़िया प्रस्तुति

Gyan Darpan
..

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

पैमाना-ए-इश्क में ,इतना रस्क भर गया ,
ढलने लगी है शाम ,पैमाने नहीं ढलते-


पेश करते हैं गुलाबों को, गाफिल दिल से ,
कभी साथ लिए वो , दिल नहीं चलते -

bahut sundar rachana . hr ak sher prabhavshali hai... bahut bahut abhar prachhann ji .

Rakesh Kumar ने कहा…

मेरे गुनाह से पर्दा, जो न उठ पाए ,
तो मतलब ये नहीं हम गुनाह नहीं करते-

सच में...बहुत सच्ची बात कही है आपने उदयजी.

आपकी हर प्रस्तुति दिल को छू लेती है.

आभार.