सोमवार, 26 दिसंबर 2011

नयनों की डोर

तुमसे बांधी है , नयनों की डोर .....डोर वे ....


               अंक  मेरे  बसा  है सुगंधों  का  झोंका ,
                विस्मृत नहीं हैं आभार उन  पलों का 


आरम्भ है न कोई उनका छोर .......


               व्योम में जब  कहीं  कोई  छाई  घटा ,
                कब   बरसोगे  आँगन  हृदय ,पूछता .


अधर चुप है फिर भी ,हो जाता है शोर ........


                चांदनी  पूर्णिमा  की रश्मियाँ  पूर्ण हैं ,
                प्रशिक्षित  दृगों में शोखियाँ कम न हैं .


तेरे कूंचे में आना ,चाहे बनना  हो चोर.......


                स्मृतियों   में  बस  के  चले  जाओगे ,
                बह  चलेंगे   नयन  कैसे समझाओगे .


कोई आँसूओं को  कब पाया बिटोर .........


                तुम  आओ  न आओ ,तेरी   कामना,
                फूल    वर्षायेंगे    हम    तेरी  राह में .


हम निभाए,निभाएंगे ,चाहो तुम तोर ......


                                         -------- उदय वीर सिंह 


           


            


            


      

9 टिप्‍पणियां:

Arunesh c dave ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा ह आपने

Rajesh Kumari ने कहा…

bahut khoobsurat prastuti.sabhi panktiyan ek se badhkar ek hain.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भाव विभोर कर गये।

Sunil Kumar ने कहा…

बहुत ही सुंदर गीत क्या बात हैं बधाई

वन्दना ने कहा…

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति।

Rakesh Kumar ने कहा…

उदय जी आपकी लाजबाब प्रस्तुति मन को आन्दोलित कर रही है.

दिल से निकल रहा है 'वाह .. वाह...'

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

आनेवाले नववर्ष कि आपको हार्दिक शुभकामनाएँ.

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
वीर हनुमान का बुलावा है आपको.

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 28-12-2011 को चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति रस घोल गई.

ASHOK BIRLA ने कहा…

bahut hi sundar ......