बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

* बेल *



उग आई बेल
चढ़ रही परवान
धीरे धीरे
दिखाने लगी है बेल एक
रंग-रूप  अनेक /
किसी साख में गुलाब ,
किसी में चमेली लाजवाब
गंधराज ,हेमपुष्पा लिली
राजीव मोगरा ,गुलदाउदी खिली
कहीं नागफनी ,कैक्टस ,बबूल
भी वजूद में
सजे तीक्ष्ण शूल
व्यतिक्रम  बेसुमार ,
नागफनी में इत्र,
काँटों में सुगंध ,मद भरा रस ,
पुष्प विष भरे
मकरंद- हीन  ,
मधुप आते नहीं पास
मन रीता उदास  /
मैंने पूछा ये क्या है ? कैसे है ?
बोली लहराती अग्रिम पंक्ति की
लता -
प्रिय !
     जब बोया शंशय, विद्वेष,घात,
     छल - छद्म ,प्रतिघात,
     बोई बेल भी लौटाएगी
     विकृत
     पुष्प -पात  ...


              उदय  वीर   सिंह
              08 -02 -2012





 
 

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जैसा देना हो जीवन में वैसा ही पाना होगा,
समय तथ्य क्यों झुठलायेगा, वह तो बतलाना होगा,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!