गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

प्रीत

न जा, 
बैठ ! पल दो पल !
पलकों में नमीं है ,
भरे हैं कोष्ठ -प्रकोष्ठ ,हृदय  के
खून से ,
मष्तिष्क उलझ गया है ,
अपने बुने जाल में ,
मंजरी  बन  गयी  है ,जिह्वा
कटु शब्दों की ,
दग्ध है अंतस  
ईर्ष्या में,
पग घायल हैं 
कंटक वीथिका में ,
कर यातना के सहचर ,
उदर, विद्रूप ! निगल जाने को  विकल ,
सृजन !
पीठ बांध लेने को उद्दत ,
धरा की खुशियाँ ,
असहजता है कितनी ,
प्रकारांतर से .....
बस  बैठ ,
पास ,
प्रीत !
मेरे पास ,
न 
जा ......


                            उदय वीर सिंह .
                            22 -02 -2012
   

7 टिप्‍पणियां:

Anupama Tripathi ने कहा…

marmsparshi ...bahut sunder rachna ..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रीत जगत की बनी रहे, इस जीवन में..

सदा ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अपने बुने जाल में ,
मंजरी बन गयी है ,जिह्वा
कटु शब्दों की ,
दग्ध है अंतस
ईर्ष्या में,
पग घायल हैं

मर्मस्पर्शी रचना

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.com
चर्चा मंच-798:चर्चाकार-दिलबाग विर्क>

RITU ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति ..कुछ कठिन शब्दों का अर्थ भी बताएं तो अच्छा होगा..
kalamdaan.blogspot.in

संध्या शर्मा ने कहा…

बस बैठ ,
पास ,
प्रीत !
मेरे पास ,

जा ......

वाह...प्रीत है तो सब कुछ है... सुन्दर