मंगलवार, 1 मई 2012

निवाला गरीब का

                                    मई दिवस  की याद  में..
    


मुशीबत   बन   गया है, निवाला  गरीब का,
हसरत   बन    गया   है ,उजाला  गरीब  का-

खैरात  में    मिला   कभी  ,पाया  हिजाब से  
दर्द   बन    गया   है  ,  दुशाला    गरीब    का  -

कमाल है कि किश्ती , भंवर से  निकाल ली  
किनारे  आ   डूबता  है , सफीना  गरीब   का -

वो    ठोकरों   से   पूछा  , अपने   गुनाह  को  ,
अब   नमूना   बन   गया है, फूटे  नसीब  का  -

कुर्बान   कर  दी जन्नत , उम्रो , जमाल  भी  
बदबूदार   हो   गया  है  ,पसीना   गरीब  का  -

माहताब  ढूंढ़  लेता , मयखाना वो  महफिलें  
अब तक नढूंढ़ पाया ,आशियाना  गरीब  का  -

                                          उदय  वीर  सिंह  .

11 टिप्‍पणियां:

dheerendra ने कहा…

माहताब ढूंढ़ लेता मयखाना वो महफिलें
अब तक नढूंढ़ पाया आशियाना गरीब का -

वाह !! बहुत सुंदर प्रस्तुति मजदूर दिवस पर...बेहतरीन रचना के लिए बधाई ...

MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

रविकर फैजाबादी ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
बुधवारीय चर्चा-मंच पर |

charchamanch.blogspot.com

S.N SHUKLA ने कहा…

सार्थक, सामयिक, सुन्दर, बधाई

मनोज कुमार ने कहा…

आज के दिन इस ग़रीब शब्द को मज़दूर से बदल देता हूं और फिर
बदबूदार हो गया है ,पसीना गरीब का
बदबूदार हो गया है ,पसीना मज़दूर का

देखिए चमत्कार। मज़दूर अगर पसीना न बहाएं तो वे जो आलीशान कोठे पर रहते हैं उनको सुख चैन कहां से मिले। पर उन्हें तो वही पसीना बदबूदार लगेगा ही।

संध्या शर्मा ने कहा…

मुशीबत बन गया है निवाला गरीब का,
हसरत बन गया है उजाला गरीब का-
सच्चाई यही है... मजदूर दिवस पर सटीक प्रस्तुति...

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत ही मार्मिक एवं सारगर्भित प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपके एक-एक शब्द मेरा मनोबल बढ़ाने के साथ-साथ नई उर्जा भी प्रदान करने में समर्ख होंगे । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

dheerendra ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति मजदूर दिवस पर...बेहतरीन रचना के लिए बधाई ..
प्रभावित करती सुंदर रचना,.....

MY RECENT POST.....काव्यान्जलि.....:ऐसे रात गुजारी हमने.....

Maheshwari kaneri ने कहा…

मजदूर दिवस पर सार्थक और सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

समाज और श्रमिक का सत्य व्यक्त करती कविता।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

सुंदर रचना...

नीरज गोस्वामी ने कहा…

खैरात में मिला कभी ,पाया हिजाब से
दर्द बन गया है , दुशाला गरीब का

मई दिवस पर गरीब की इस से बढ़ कर और कैसे व्यथा बयां होती...वाह...कमाल किया है आपने

नीरज