मंगलवार, 22 मई 2012

द्वि - कोशीय ,

प्रीत  न बांधों  रीत में ,बिन बांधे  बंध   जाय,
पावक -पुंज, सनेह सम ,ज्यों बारे जल जाय -


प्रश्न -  पयोधि   से  दूर है ,प्रीत   संग  है  मीत ,
शंसय  की   बंशी  परी , तिरीसठ  हो  छत्तीस-


शहनाई   न   जानती ,  बाजे   मोल  - बेमोल,
हृदय में बजते राग को,क्या जाने डफ व ढोल-


पलक को लागा हाथ कब ,आंसू को कब पांव,
गति  निरंतर  साथ  है , बादल  को कब छाँव-


टूटे  श्वांस  न  जीव   है , टूटे   स्वर  नहीं  गीत,
अधर सजे  जब गीत हों ,मुक्त  हार और  जीत-


तरुअर   छोड़े   छाँव   को , सागर   छोड़े  नीर,
विरहन  छोड़े   गाँव   को , हृदय   न छोड़े  पीर-


पथिक  पड़ोस   न  पूछता , पूछे  अग्रिम ठौर ,
रात  बितायी चल पड़ा ,लगन  हृदय  की और-


पांव , पथिक ,पथ ,पालना ,जो  पाए  विश्राम,
अवसर  चूक  अधोगति ,  नींद  परायी   धाम-


आँखों   में  सपना  बसे , काजल  से  धुंधलाय,
कारे  केश घटा  बन  छाये , सावन सुना जाय-


                                                         उदय वीर सिंह .
                                                          22- 05 - 2012
  




   
       











15 टिप्‍पणियां:

dheerendra ने कहा…

पथिक पड़ोस न पूछता , पूछे अग्रिम ठौर ,
रात बितायी चल पड़ा ,लगन हृदय की और-

वाह ,,,, क्या बात है,,,, बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,,

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Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

सभी लाजवाब दोहे - एक से बढकर एक! आज तो छा गये आप।

ZEAL ने कहा…

पांव , पथिक ,पथ ,पालना ,जो पाए विश्राम,
अवसर चूक अधोगति , नींद परायी धाम...

awesome...

.

RITU ने कहा…

पढने में आनंद आया ..धन्यवाद

रविकर फैजाबादी ने कहा…

खूबसूरत रचना ||

नीरज गोस्वामी ने कहा…

पांव , पथिक ,पथ ,पालना ,जो पाए विश्राम,
अवसर चूक अधोगति , नींद परायी धाम-

अद्भुत...वाह...इस बेजोड़ प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें...

नीरज

mahendra verma ने कहा…

पलक को लागा हाथ कब ,आंसू को कब पांव,
गति निरंतर साथ है , बादल को कब छाँव-

सीख देते दोहा-सुमनों का सुंदर गुलदस्ता।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

इतने सुन्दर दोहे सब के सब दोहें..

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट 24/5/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा - 889:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

पुरुषोत्तम पाण्डेय ने कहा…

वाह, बहुत बढ़िया रचना.

Kailash Sharma ने कहा…

पथिक पड़ोस न पूछता , पूछे अग्रिम ठौर ,
रात बितायी चल पड़ा ,लगन हृदय की और-

...बहुत खूब ! बहुत सुन्दर....

सतीश सक्सेना ने कहा…

सुंदर रचना ...
कलर बदल दें तो पढने में आसानी होगी !
शुभकामनायें आपको !

M VERMA ने कहा…

सुन्दर दोहे
बेहतरीन

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

आप तो बहुत ठेठ हिंदी लि‍ख देते हैं जी.

udaya veer singh ने कहा…

मित्र मैं पहली बार किसी को अपनी हिंदी के बारे में धन्यवाद देना चाहता हूँ ,जैसा अपने मुझे प्रशंसित किया ... भाषाओँ को हमने चुनौती के रूप में लिया / मेरे लेक्चर को स्कालर व काव्य को श्रोता बड़े ही मनोयोग से सुनते हैं ,ऐसा क्यों है ,यह मैं भी नहीं जनता .... अच्छा लगा जी आपकी टिपण्णी / साधुवाद ! काजल कुमार जी