मंगलवार, 18 सितंबर 2012

किस्तों में जिंदगी ,

नस्तर से कट गयी  ,किस्तों में जिंदगी ,
जख्म       गहरे,     हरे      हो     गए   हैं -
 कैद-  ए -   महंगाई    में ,  गमजदा   हो
अपना    जीवन     बसर     कर   रहे  हैं -

देखा , रोटी तो हंसकर  के  कहने  लगी ,
अब          तुमसे         परायी         हुयी-
अमीरों    का    पहलू     मिला  है   मुझे
दौलत      से      मेरी      सगाई        हुई  -

पेट   से    कह   रहा हूँ   मुझे   छोड़    दो ,
हम    तुमसे   मुख्तलिफ     हो   रहे   हैं -

आग  जलनी थी चूल्हे में ,दिल में लगी ,
मुफलिसी  का  शहर ,आग  ही  आग है ,
क्या  खाए ,बिछाए,ओढें  क्या  तन पर,
महगाई   का  दामन , दाग  ही   दाग है -

शैतानों की  साजिश, इनसान रो रहा है,
रिजवान रहबर, मसखरी   कर   रहे  हैं-

लुटेरों    के     हाथों  , तख़्त   तंजीम   है ,
उनकी  महफ़िल  में  सूरज  अनेकों उगे,
जलते  हैं   दीये  जब   दिल  को  जलाये ,
जहर  मुफलिसी  में   कितने  पीने लगे-

हसरतें , ख्वाब   के  दरमियाँ   रह  गयीं,
साज़िशों    के   अंधेरों  में गुम  हो  रहे हैं-

                                                  उदय वीर  सिंह  .


























5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

किश्तों में बीतती ज़िन्दगी , बँटा सा अस्तित्व लगता है।

dheerendra ने कहा…

मँहगाई के कारण ही बट गई जिंदगी किश्तों में
दूरी बढ़ जाती आपस में,दरार पड रही रिश्तों में,,,,,

RECENT P0ST फिर मिलने का

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

देखा , रोटी तो हंसकर के कहने लगी ,
अब तुमसे परायी हुयी-
अमीरों का पहलू मिला है मुझे
दौलत से मेरी सगाई हुई

सच कहा गया है- जहाँ न पहुँचे रवि, पहुँचे वहाँ कवि

मन को छू गई ये पंक्तियाँ....आभार

सदा ने कहा…

वाह ... बेहतरीन

Virendra Kumar Sharma ने कहा…


हसरतें , ख्वाब के दरमियाँ रह गयीं,
साज़िशों के अंधेरों में गुम हो रहे हैं-
कैसे लिख लेते हो मेरे यार ,
इतने पीने अशआर ?