शनिवार, 29 सितंबर 2012

क्या थे वादे .....









क्या   थे  वादे , क्या  निभाया  
क्या       निभाना     शेष     है
स्मृतियों   का    लोप     होना ,
विध्वंश     का      सन्देश    है -

प्रदत्त     थे    अधिकार    सारे
चिंतन   के    ,  निर्माण     के
धुल   -  धूसरित     हो      गए ,
स्वप्न   ,   स्वाभिमान       के -

मसल    गया   है  जूतियों से,
उत्सवों         का        देश   है


शक्तिहीन   ,    बाजुओं       में ,
शमशीर   कब    शोभित  हुई,
दुर्बल      इच्छा -शक्ति       से ,
रणभूमि   कब   विजित   हुई-

रण  छोड़  कर  भागे  हुए  का,
 कब      हुआ     अभिषेक   है -

भूख    बस    गयी   गाँव   में ,
भय       शहर     में   शालता,
बल  गया , आत्म - बल नहीं ,
उर    में    बसी    है    दैन्यता ,

इक्कीसवीं   सदी  के राष्ट्र  का ,
क्या     यही      उद्दघोष     है -

राशन , पानी,  औषधि    नहीं ,
बिजली  नहीं  अभिशप्त   दंश,
विपन्नता    स्वीकार     क्यों,
स्रोत  आय   के  यहाँ  अनन्य-

जनित  हुआ  क्यों द्रोह  भाव ,
क्या   मां -  भारती   से द्वेष है -


भ्रम     व    वैराग्य     के   घन
उन्माद     में       छाये      हुए,
विक्षिप्त  सा  परिदृश्य  कायम
अनिश्चितता      समाये     हुए-

दुर्दिन , कराह  पीड़ा  ही  क्या
राष्ट्र         का       आदेश      है-

                            उदय वीर सिंह ,
                              29 /09 /2012

                           


   


   

8 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
रविकर ने कहा…

पहली टिपण्णी हटा दें कृपया ||
सुन्दर गीत पर बधाई सरदार जी -

स्वाभिमान अभिमान अब, दया दृष्टि में खोट |
अपने ही पहुंचा रहे, भरता माँ को चोट ||

रविकर ने कहा…

उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

स्वाभिमान अभिमान अब, दया दृष्टि में खोट |
अपने ही पहुंचा रहे, भारत माँ को चोट ||

Dheerendra singh Bhadauriya ने कहा…

क्या थे वादे,क्या निभाया
क्या निभाना शेष है
स्मृतियों का लोप होना ,
विध्वंश का सन्देश है -

देश की दिशा और दशा देखकर कष्ट होता है
बढ़िया अभिव्यक्ति,,,,उदय वीर जी,,,बधाई,,,

RECENT POST : गीत,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

सुशील ने कहा…

बहुत सुंदर रचना !

काव्य संसार ने कहा…

बौट ही सुंदर प्रस्तुति |
इस समूहिक ब्लॉग में पधारें और इस से जुड़ें |
काव्य का संसार

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

देश बनेगा,
गढ्ढे भरना काम हमारा,
भावी पीढ़ी सरपट भागे।