शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

रफ़्तार देनी है -
























गिरे -बिखरे पत्थरों को समेट,
गंतव्य    को     राह    देनी  है -
अँधेरा कहीं  तिरोहित हो चले ,
हर  हाथों  में  मशाल   देनी है -
न टूट  सके आघातों से  ह्रदय ,
पत्थरों   की    दिवार  देनी  है-
भंवर सामने है,डूबने से पहले ,
नाव    को    पतवार   देनी   है-

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हम  उजड़ने नहीं देंगे  गुलशन ,
गुलों      को     एतबार       देंगे,
अगर खून  से  रंग निखरता है ,
तो दानवीरों  की कतार देनी है-
कही मसला न जाये उत्सवों में ,
कदमों  को   ख़बरदार  देनी  है-
बागवान   कोई   मायूस  न  हो,
खुरपे के साथ ,तलवार  देनी है -

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यूँ  अफ़सोस कर  लेने  से मुकाम ,
कभी        हासिल     नहीं     होते ,
हौसले   बसते   हर   दिलों   में  हैं ,
महज    एक    आवाज    देनी   है-
सोते प्रतीक्षा में हैं दरिया बननेको,
कर चोट  गैंतियों की , धार देनी है-
तुम निभाओ ,कुछ  हम निभाएंगे,
थमे हुए पहियों को रफ्तार,देनी है-

                             उदय वीर सिंह
   

7 टिप्‍पणियां:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत ख़ूब वाह!

आपकी नज़रे-इनायत इसपर भी हो-

रात का सूनापन अपना था

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

bahut hi sahi soch ke sath likhi gayi sunder rachna.

Dheerendra singh Bhadauriya ने कहा…

तुम निभाओ ,कुछ हम निभाएंगे,
थमे हुए पहियों को रफ्तार,देनी है-

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ,,,,,,मित्र उदयवीर जी,,,

MY RECENT POST: माँ,,,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कितना कुछ करना बाकी है,
मन से अब लड़ना बाकी है।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.

Rakesh Kumar ने कहा…

यूँ अफ़सोस कर लेने से मुकाम ,
कभी हासिल नहीं होते ,
हौसले बसते हर दिलों में हैं ,
महज एक आवाज देनी है-
सोते प्रतीक्षा में हैं दरिया बननेको,
कर चोट गैंतियों की , धार देनी है-
तुम निभाओ ,कुछ हम निभाएंगे,
थमे हुए पहियों को रफ्तार,देनी है-

जोश और प्रेरणा से भरपूर हौंसलाअफजाई करती प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार,उदय भाई.