गुरुवार, 1 नवंबर 2012

संवेदना के सिवा ....












मानवीय 
संवेदनाओं,
का संसार ,क्रूरता को
परिभाषित तो करता है ,
अपनी संवेदनाओं को समेटने को,
क्रूर नहीं कहता ..
घृणा की प्राचीर का प्रांकन तो,
करता  है ,
स्पंदन की गोलियां लेकर
आत्ममुग्धता में सो जाने को ,
दायित्व विहीन  नहीं कहता   l
अपनी आँख धोते हुए घडियाल के
आंसुओं को, बेदना में बांध लेना ,
नीरहीन,सूखे चक्षुओं को
काव्य-भेदन के सिवा
अनुशीलन नहीं मिलता..
सबल नयना को,
 निहारते हजारों हैं,
हत-नयना को,
संवेदना के सिवा
संबल नहीं मिलता ....

                    - उदय वीर सिंह

 

8 टिप्‍पणियां:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात है वाह! बहुत ख़ूब पेशकश

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छे भाव ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 01- 11 -2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में ....
इस बार करवाचौथ पर .... एक प्रेम कविता --.। .

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

भाई उदय जी बहुत अच्छी कविता |

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच कहा आपने, ये प्रश्न तो अब तक अनुत्तरित है..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया!
करवाचौथ की अग्रिम शुभकामनाएँ!

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. मधुर भाव लिये भावुक करती रचना,,,,,,

सुमन कपूर 'मीत' ने कहा…

बहुत सुंदर ...