सोमवार, 5 नवंबर 2012

तू नदी है प्यार की ....





भूल  जाते , देख  कर  दुःख 
तू    नदी    है    प्यार     की 
बह   रहा    है , मान पियूष 
ले   अर्घ,    तेरे    धार    की

तू  उज्वला  है, सृजन वलय 
निः शब्द     तेरे   पाश    में ,
बह   गया ,  घर   वेदना  का 
नेह - सर    के    न्यास     में -

तृप्त    मन  की  आश तुमसे,
कृतज्ञ       हूँ    उपकार  की -

निर्मित  हुआ  है आत्म बल 
पाई       तुम्हारी     छाँव   है 
बस   गया   मन  मधुर मेरा ,
जिस    ठाँव ,  तेरा   गाँव  है-

मांगी  न  थी  पर मिल गया ,
आश      भी ,  आधार     भी -

खिलता   कमल   सा  रूप है,
एक   बूंद   भी,   मोती लगे,
सदगुणों   की   स्वेद  आभा,
लिपटे   वसन,  सोनी   लगे-

प्रतिमा बनी आराध्य की तू ,
साध्य    की , संस्कार   की-

एक      प्रबल    प्रवंचना   है,
तज ,स्वर्ग  न  जाना  कभी-
अवशेष   हैं  बहु  कार्य  अग्रे,
अप्रतिम बने   यह लोक भी-

मान    लेना ,   मान     मेरा,
हठ   समझ   कर   यार  की-

है   हृदय   में  संचयित  स्वर 
निर्मले       आभार         की-

                            - उदय वीर सिंह 


   
  
   

9 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

एक और खुबसूरत प्रस्तुति |
बधाई आदरणीय उदय जी ||

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बरसता उपकार रह रह,
रहे तेरी उपस्थिति भर।

dheerendra bhadauriya ने कहा…

मान लेना , मान मेरा,
हठ समझ कर यार की-
है हृदय में संचयित स्वर
निर्मले आभार की-

भावमय उत्कृष्ट पंक्तियाँ,,,,,,,
RECENT POST : समय की पुकार है,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा!

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 6/11/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुंदर भाव ॥

सूर्यकान्त गुप्ता ने कहा…

शब्द सुसज्जित सुन्दर रचना......

आभार !!

Anita ने कहा…

तृप्त मन की आस तुम्हीं से... कृतज्ञ हूँ उपकार की......~यही भाव दिल में उठते हैं हर पल...
~सादर

PRAN SHARMA ने कहा…

AAPKEE RACHNAA PADH KAR AANANDIT
HO GYAA HUN .