शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

कांटे भी लगाने पड़ते हैं -



ऊँचे  स्वर, पत्थर से लगते ,
फिर  भी  देने       पड़ते   है
फूलों   की   रखवाली   हित
कांटे  भी    लगाने  पड़ते  हैं -

रस्ते     के     देवालय     को
निहितार्थ    हटाने   पड़ते  हैं
तन आरोग्य,   की  बाधा में
कुछ   अंग   कटाने  पड़ते हैं -

आये     शरण  की आश लिये
सब    घाव   भुलाने   पड़ते हैं ,
आदर्श,शील ,ध्वजवाहक को
शीश     झुकाने     पड़ते     हैं -


संबंधों       को     श्रेय     मिले  
सम्बन्ध  मिटाने     पड़ते  हैं  
अपने   जब     मैले   हो  जाएँ  
दाग       मिटाने       पड़ते  हैं  -

बिंध  जाये  जब  धरा  धरातल  
अंतस   मानस    सुन्दर   मन  ,
विष-बाण विनाश के  स्रोत बने  
वो   शब्द     हटाने    पड़ते   हैं  -

मर्यादा   का    भाव   तिरोहित 
रुधिर   हृदय  का  कलुषित  हो , 
जीवन   को   अवसान    परोसे,
वो     तत्त्व    हटाने      पड़ते हैं    



                     - उदय वीर सिंह

5 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

यथार्थ -
बढ़िया प्रस्तुती |

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत सुंदर उत्कृष्ट रचना,,,

recent post : प्यार न भूले,,,

वन्दना ने कहा…

आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (24-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अवांछित को रोकने के लिये उपाय तो करने ही होंगे..

Reena Maurya ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन रचना...