रविवार, 2 दिसंबर 2012

परिहार


बयाँ      कर     रहा     है ,  जिस्म    का
हर   सुराख़ , गोली  सीने  में   खायी  है,
ये  अलग है,लगाया सीने से एतबार था  
नजदीक  से  गोली, अपनों   ने  मारी है-

पाबंद   है  लहू  ,रगों में  बहने के लिए
सडकों  पर  बहाना   इल्म  से धोखा है ,
नफ़रत  कुफ्र  से  हो ,होनी  भी चाहिए
इन्सान     से    हो ,   कहाँ     लिखा  है-

जब  भी   सिंकी  रोटी, आग   में  सिंकी
जली भी आग में जब सलीका न आया
लड़े   गए   जंग , वजूद   भी    उसी   से
दौरे उलफत या नफ़रत, रोटी  ही खाया -

हमारे  वजूद  से ये  दुनियां नहीं कायम,
बा -  वजूद   हैं   दुनियां    में    हम   भी,
किसके वजूद से किसका वजूद कायम है  
जबाब   आये ,  तो    सवाल   अच्छा  है -

                                       -उदय वीर सिंह




7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत गहरी और प्रभावी रचना..

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत ख़ूब!
आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 03-12-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1082 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

Rohitas ghorela ने कहा…

बहुत ही लाजवाब पोस्ट .. गहन भाव

मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है

http://rohitasghorela.blogspot.com/2012/11/3.html

Rohitas ghorela ने कहा…

बहुत ही लाजवाब पोस्ट .. गहन भाव

मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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Anita ने कहा…

बहुत अच्छी रचना !
~सादर !!!

Ayodhya Prasad ने कहा…

पाबंद है लहू ,रगों में बहने के लिए
सडकों पर बहाना इल्म से धोखा है ,
नफ़रत कुफ्र से हो ,होनी भी चाहिए
इन्सान से हो , कहाँ लिखा है

बहुत बढ़िया ..

 बांके बिहारी कहाँ मिलेंगे ?

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत खूबशूरत सुंदर प्रस्तुति

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