सोमवार, 17 दिसंबर 2012

-लिव- इन -रिलेसनशिप-




-लिव- इन -रिलेसनशिप- 

माँ ने पूछा था ,

शरद कैसी है बहु ,
साथ नहीं आई  ?
नहीं माँ ,
फिर कभी ...
सुना है ,सुन्दर है नौकरीपेशा है....
बताओगे नहीं उसके बारे में ...
हाँ जी ! फिर कभी ....
माँ ! अपर्णा की सगाई, शादी ...
बताया नहीं,किसी ने
कुछ भी मुझे .. 
क्या करती, बच्चा गोंद में  था,
वह लिव- इन -रिलेसनशिप में थी | 
तुम्हारा जबाब था, 
फिर कभी .... |
हाँ करनी पड़ी ,
मुए कलूटे बद्दजात के साथ  ..|
थोड़ी देर पहले तेरी बीबी समीर 
का फोन ,
सूचित कर दिया मुझे   
तुम भी लिव- इन -रिलेसनशिप में हो 
बेटी की तो, गोंद भी भरी 
अपनी पुरुष- बहू की 
गोंद भराई भी नहीं कर सकती ,
ये कैसी विधा है ,
विधान है .....
संसकारों का परिमार्जन
या अवसान है ...  |

                       - उदय वीर सिंह 


  

  
    
  

7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन को मारे, मन न मारे।

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 18/12/12 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका इन्तजार है

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत खूब!

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,,,,

recent post: वजूद,

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत ही बढिया।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... समाज की इस विडंबना को बाखूबी लिख दिया ...

मन के - मनके ने कहा…

रिश्तों का फैलाव या बिखराव,प्रभु ही जाने.