सोमवार, 28 जनवरी 2013

तेरे आईने में
















हसरत   से   तेरे  आईने   में  देखा  
मेरा     चेहरा    ही   नजर    आया-

जिसको    तू   अपना   कहता   था
तेरा   साया    भी    गैरहाजिर   था ,
हुजूम  था   अपना   कहने  के लिए
तुझे  अकेला  शमशान  छोड़ आया
 
क्यूँ  रोता  है  बेजार ,दगाबाजी  पर
तुम    भी     तो    दोगे    एक   दिन ,
बिन   बताये , बिन  पयाम  मितरां
रुखसत    कर   जायेगा  एक   दिन-

तेरी  दोस्ती  से,तेरी  दुश्मनी बेहतर
मेरी  आँखों  में तेरे ख्वाब तो न होंगे,
मुन्तजिर न  होंगे किसी  कि राह में
किसी के आने के इंतजार तो न होंगें -

मुकद्दर  लिखने  का  दम भरने वाले
तू    भी    मुकद्दर   का   तलबगार है ,
चार   कंधे,  कफ़न   दो  गज  जमीन
का मिलना  भी  मुकद्दर  की बात  है-

दिलों   की   तंगदिली   का  आलम है
कि   टूट   जाते    हैं , बिखर  जाते  हैं
अरे   दिल   क्या   हुआ खुदा  हो गया
खुदा   भी   रुठते  हैं ,  मान   जाते  है-

                                  -  उदय वीर सिंह 





4 टिप्‍पणियां:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह!
आपकी यह प्रविष्टि को आज दिनांक 28-01-2013 को चर्चामंच-1138 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

दिलों की तंगदिली का आलम है
कि टूट जाते हैं ,बिखर जाते हैं
अरे दिल क्या हुआ खुदा हो गया
खुदा भी रुठते हैं ,मान जाते है-

उम्दा भावपूर्ण,,अभिव्यक्ति,,,
recent post: कैसा,यह गणतंत्र हमारा,

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक दिन जब सबको जाना है,
क्यों रुककर रह यूँ जाना है।

Johny Samajhdar ने कहा…

अत्यंत भावपूर्ण अभिव्यक्ति | सादर आभार |


Tamasha-E-Zindagi
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