गुरुवार, 17 जनवरी 2013

फिजां कह रही है ....


फिजां  कह  रही  है, देख !  कैसे  वक्त
करवट  ले   रहा  है
ब्रह्मवेत्ता , छद्म - वेत्ता  की  राह  में ,
ज्ञानी   कर   वसूल   रहा  है-
सन्यासी  धर्म  की  आड़ में  कितनी
संजीदगी से छल रहा है  -
तोता  बांचता   इन्सान  का  भाग्य
ज्योतिषी  सो  रहा है-
तक़दीर  बन  गयी  है  आवारा  बादल
कर्म उपेक्षित  रो  रहा  है -
तिलस्म पर कब कायम जिंदगी का वजूद
यथार्थ से मुख मोड़ रहा है-
शांति  का  वाचक ,बारूद  की  गोंद में
अंगारे  बो   रहा  है -
विडम्बना  है -
ढोर डंगरों सा समाज,आज भी शालीनता से
इनका बोझ ढो  रहा  है -

                                            -उदय वीर सिंह


4 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

देश गर्तमय, हम साक्षी हैं।

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

Kailash Sharma ने कहा…

ढोर डंगरों सा समाज,आज भी शालीनता से
इनका बोझ ढो रहा है -

...यही आज का विडम्बना है...बहुत सटीक अभिव्यक्ति..

Madan Mohan Saxena ने कहा…


वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
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