मंगलवार, 19 मार्च 2013

श्रद्धेया-


श्रद्धेया-
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कभी  कुंआरी  थी अब  पेट से  है  कलम  
ठहराव  आ  गया  है  ,रफ़्तार  कम  है  -

प्रवाह  था  रोशनाई  में  अब  जम  गयी  है  
चलती है नफा -नुकसान का मायना लेकर  -

रहता आईना साथ था अब हिजाब रहता है  
देखती  कुछ  और  लिखती  कुछ  और  है  -

खौफ  था ईमान  का,अब ईमान खौफ में है  
जारी  हो  जाते  हैं बयान जो  दिए नहीं गए  -

दहशतजदा हो जाएगी इतनी सोचा नहीं कभी  
छिपने  लगी  है जेब  में  शमशीरे आवाम थी  -

                                   ----   उदय वीर सिंह 

  


4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति!
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आपकी इस पोस्ट का लिंक आज के चर्चा मंच पर भी है!
सादर ...सूचनार्थ!
http://charchamanch.blogspot.in/2013/03/1188.html

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कलम को भी अपनी सृजनता पर गर्व होगा..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत उम्दा ,,,जबाब नही आपकी लेखनी का,,,बधाई

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Rajendra Kumar ने कहा…

वाह,क्या सार्थक पंक्तियाँ हैं,आभार.