शुक्रवार, 10 मई 2013

प्रेम की डोर सखी घट बांधे...


मधु ,मकरंद  निश्छल सरिता   
मद   अभिशप्त    हुआ   करता 
धोती   सरिता   अपशिष्ट  मैल
मद ,जीवन  कांति क्षरा करता -

कुछ  पल  भ्रम, व्यतिक्रम  के
जीवन    आचार   नहीं     होते
जब स्नेह पयोधि हृदय में होवे 
कई  जन्म  यहाँ  जीया करता-

आशा  अवलम्बित  जीवन  है 
नैराश्य    पतन   को  भाता  है 
पुरुषार्थ विजय का सखा मीत
परमार्थ संकल्प  लिया करता-

भर   गागर   प्रेम  ही  पावन  है
प्यास   युगों    की   मिटती   है
प्रेम  की  डोर  सखी  घट   बांधे 
जल - कूप  में जा  डूबा  करता-

                            -  उदय वीर सिंह    

       











9 टिप्‍पणियां:

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(11-5-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

सुन्दर छान्दसिक कविता |

Vandana Tiwari ने कहा…

पुरुषार्थ विजय का सखा मीत..
अति सुन्दर कथ्य।
इस गहन रचना के लिए सादर बधाई।

expression ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता.....

सादर
अनु

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर सार्थक छान्दसिक कविता का सृजन.

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत सुन्दर भाव !

अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post'वनफूल'
latest postअनुभूति : क्षणिकाएं

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर रचना
बहुत सुंदर

Asha Saxena ने कहा…

भावपूर्ण रचना |
"आशा अविलम्ब जीवित है -----परमार्थ संकल्प लिया करता "
आशा

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

डोर पतली, बँाधती जीवन रुपहला।