मंगलवार, 21 मई 2013

रहबर नहीं है-

जो   कहा   है , आज  तुमने 
ये   तुम्हारा   स्वर   नहीं  है-

सोच   लो    बैठे    जहाँ   हो 
वो   तुम्हारा    घर   नहीं  है- 

खा  रहे   हो  कसमें  जिनकी
वो    कोई    ईश्वर   नहीं   है -

चल    दिए   हो   हाथ  पकडे,
वो    तेरा    रहबर    नहीं   है-

तुम  तो  डरते  हो  जिंदगी से 
उसे  क़यामत  से  डर  नहीं है-

                   -- उदय वीर सिंह  

4 टिप्‍पणियां:

अरुन शर्मा 'अनन्त' ने कहा…

आपकी यह रचना कल मंगलवार (21 -05-2013) को ब्लॉग प्रसारण के "विशेष रचना कोना" पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

Rewa tibrewal ने कहा…

sundar abhivyakti....

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

वाह !!! बहुत उम्दा गजल,,,

Recent post: जनता सबक सिखायेगी...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत प्रभावी रचना।