रविवार, 26 मई 2013

इतनी ऊँची उड़ी पतंग.......


विस्वास  की नींव, कितनी कमजोर हो गयी है ,
इतनी  ऊँची उड़ी पतंग की बिन डोर हो गयी है -

पानी की  कमी प्यासा  है देश, रिपोर्ट कहती है 
खून इतना सस्ता है ,सड़क सराबोर  हो गयी है -

बाजार में खड़ी है ,बिकने को इंसानियत मितरां 
पहचान में नहीं आती कितनी कमजोर हो गयी है -

रिश्तों का सूनापन  बहुत दूर तक बिखरा हुआ है 
सुबह कितनी अकेली है,शाम बहुत दूर हो गयी है-

तन्हा दर्द दिल का,ढोना है किसी मजदूर की तरह 
बेटा  हमदर्दी  से  दूर , बेटी  मजबूर  हो  गयी  है-

नुमायिस  बन  कर रह गयी है ज़माने  में जीस्त 
अब  महफिलों  में मुफलिसी  मशहूर  हो गयी है -

                                                      -  उदय वीर सिंह 



10 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पानी की कमी प्यासा है देश, रिपोर्ट कहती है
खून इतना सस्ता है ,सड़क सराबोर हो गयी है -

इन पंक्तियों ने झकझोर कर रख दिया है।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

नुमायिस बन कर रह गयी है ज़माने में जीस्त
अब महफिलों में मुफलिसी मशहूर हो गयी है -
बेहतरीन प्रस्तुति सुंदर गजल ,,,

RECENT POST : बेटियाँ,

yashoda agrawal ने कहा…

लाजवाब प्रस्तुति
बाजार में खड़ी है ,बिकने को इंसानियत मितरां
पहचान में नहीं आती कितनी कमजोर हो गयी है -



सादर

संजय जोशी "सजग " ने कहा…

अच्छा लगा

अरुन शर्मा 'अनन्त' ने कहा…

आपकी यह रचना कल सोमवार (27 -05-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

कितने कड़वे सच!

Prashant Suhano ने कहा…

रिश्तों का सूनापन बहुत दूर तक बिखरा हुआ है
सुबह कितनी अकेली है,शाम बहुत दूर हो गयी है-
........बेहतरीन.......

मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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मदन मोहन सक्सेना ने कहा…

बहुत खूब
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