बुधवार, 29 मई 2013

सरमाया है .



सरमाया है ....
कुचली गयी है कितनी
जो जीवन का सरमाया है ....
ढोल गंवार... नारी
दादी पढ़ती थी
मां  पढ़ती है ...
दादा जी व्याख्यायित करते
पिताजी उपकृत होते
सतवचन  कह कर ....|
कच्ची उम्र की देव-दासी
नगर वधु का दैवीय सम्मान
कोक व रति शाश्त्र में स्त्री
कितनी महान....|
निर्लज्ज समाज ने देखा सिर्फ
उसकी देह ,कमनीयता, अंग ....
शाश्त्र सम्मत बना दिया
उसकी गुलामी .......|
न दिया प्रतिकार का अधिकार भी,
भूल गया कि.....
वह किसी स्त्री का ही जाया है
मां बेटी बहन पत्नी के सन्दर्भ
मान्य तब तक हैं
जब तक पुरुष को भाया है ,
वरना स्त्री देह से अधिक कुछ भी नहीं ......
पशु घोषित करने वाला,
पशु से भी बदतर
हो आया है....  

                                 -- उदय वीर सिंह





4 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत उम्दा प्रस्तुति,,

Recent post: ओ प्यारी लली,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज बुधवार (29-05-2013) बुधवारीय चर्चा ---- 1259 सभी की अपने अपने रंग रूमानियत के संग .....! में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

षडयन्त्रों के पार सभी की राह बनेगी।

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

उत्कृष्टतम प्रस्तुति !!