शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

जगाओ न वीथियों

जागो , जगाओ  न   सोने  दो  वीथियों 
मुद्दतों  के  बाद घर  नींद  मेरे आई  है-

सपने  सुहाने   दो  हमको   भी   देखने     

आँखे  उनीदीं   नींद  कितनी  परायी है-

बीते संवत्सर दिन निर्णय की आश में 
प्रतीक्षा की पाती आज पता ढूंढ़ आई है -

भ्रम  का  महल टूट  जाना ही अच्छा है ,

मरुधर ने प्यास कब किसकी बुझाई है -

जाओ  मुझे   छोड़   रहबर  न    चाहिए ,

स्मृतियों की सेज मेरे पास लौट आई है -

                         
   -  उदय  वीर सिंह 

9 टिप्‍पणियां:

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार, 23/08/2013 को
जनभाषा हिंदी बने.- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः4 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

डूबने जो मुझे अपने ही स्वप्नों में।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात बधाई!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात बधाई!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात बधाई!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात बधाई!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात बधाई!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

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चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

क्या बात बधाई!