रविवार, 22 सितंबर 2013

सिया तो करो -

गुजर  जायेगी  जींद , जिया  तो  करो
थोड़ी - थोड़ी  प्रीत- मद पिया तो  करो-
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पीर की व्यथाओं में प्रीत मूक जाये ना
धागे  हैं   नेह    के  कहीं  टूट जाये ना -
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फटा  तेरा आँचल देख ,सिया तो करो -
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पढोगे ह्रदय  से मीत प्रीत की रुबाईयाँ
आँचल  भरेगा  इतनी पाओगे खुशियाँ-
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पाओगे   इतनी   प्रीत  दिया  तो  करो -
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बिखर  जाएगी  टूट  सदमों में जिंदगी
जब  भी काम आएगी आएगी वन्दगी -
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प्रेम की दवा को नियमित लिया तो करो -

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                                    - उदय वीर सिंह .








6 टिप्‍पणियां:

Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .....!!

expression ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति.....

आभार
अनु

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत खूब,सुंदर रचना !

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Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - सोमवार - 23/09/2013 को
जंगली बेल सी बढती है बेटियां , - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः22 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra





कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!
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प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

प्रेम सबकी दवा है...