रविवार, 29 सितंबर 2013

विषाक्त .

 -विषाक्त -
***
हैरानगी है, 
उसका हर लब्ज  था 
इंसानियत के खिलाफ। 
उसके कदम 
जमीं पर नहीं,
लाशों पर थे। 
हाथों में  कलम नहीं 
पिस्तौल थी ,
आँखों में प्यार नहीं 
नफ़रत थी 
बेसुमार। 
वो कल भी जिन्दा था 
आज भी है। 
आखिर !
क्यों है  ?
उसके संसकारों से 
इस ज़माने का
सरोकार।
  

                    उदय वीर सिंह 

3 टिप्‍पणियां:

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

भावपूर्ण रचना |

मेरी नई रचना :- जख्मों का हिसाब (दर्द भरी हास्य कविता)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हिंसा को सब सिद्ध कर रहे,
अपने अपने आदर्शों से।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत बढ़िया,सुंदर सृजन !

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