रविवार, 8 दिसंबर 2013

बड़ा यह देश है -

कहीं कुछ जल  गया ,कुछ जल  रहा
कुछ  जलना  कहीं  अभी  भी  शेष है -

कहीं   घर, संस्थान     उद्यान   गौरव
कही  जला चिर मान  भग्नावशेष  है-

जला  हृदय  कहीं  ,सम- भाव  वैभव
जली  कहीं  पुण्य  संस्कृति अशेष  है -

हिल रही बुनियाद भूमि  दलदली हुयी
प्रबुद्ध उद्दघोष नवनिर्माण का सन्देश है -

जल  रहा  मानस , आग  जलती  रहे
चिता द्रोहियों की जलनी अभी  शेष है -

अवांछित रीत का संज्ञान ले ले शौर्यता
किसी व्यक्ति पंथ से कहीं बड़ा ये देश है -

                                   -  उदय वीर सिंह



                      

8 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर वाह !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (09-12-2013) को "हार और जीत के माइने" (चर्चा मंच : अंक-1456) पर भी है!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (09-12-2013) को "हार और जीत के माइने" (चर्चा मंच : अंक-1456) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kaushal Lal ने कहा…

बहुत सुंदर...........

Anupama Tripathi ने कहा…

बहुत सुंदर भाव ...उज्ज्वल रचना ...!!बधाई ।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रक्त की यह ऊष्णता, लक्षण हमारा।

आशा जोगळेकर ने कहा…

अब तो वही जलेगा जो कुत्सित है। समय बदल रहा है।