शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

पीयूष की प्रत्याशा में,

खुल जाये आँचल दर्द भरा,सीता रहा हूँ मैं
पीयूष  की प्रत्याशा में,विष   पीता रहा  हूँ मैं -
हर शब् की सहर होती है इतना तो यकीन है 
ले रौशनी की आश अंधेरों में जीता रहा हूँ मैं -

 कुछ अदावत रही  पैरों से पत्थरों की यक़ीनन
ले   जख्म   गहरे  पांव  सफ़र   करता  रहा हूँ मैं-
फुर्सत    मिली  कहीं  बैठ कर रो लूँ हालात पर
अश्कों  की  तरह आँखों से बस ढलता रहा हूँ मैं

ये जान  कर  भी ,मधुमास    चला  जायेगा
उँगलियों   पर  आने  के  दिन  गिनता रहा हूँ मैं-
उदय   मालूम   नहीं  परदेसी   का  पता  हमको
स्नेह   की   पाती  फिर  भी  लिखता  रहा हूँ मैं -


                                                                                -  उदय  वीर सिंह

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर लिखते हैं आप
आप पढ़ते भी होंगे ना कभी कभी :)

Kailash Sharma ने कहा…

कुछ अदावत रही पैरों से पत्थरों की यक़ीनन
ले जख्म गहरे पांव सफ़र करता रहा हूँ मैं-
...वाह..बहुत मर्मस्पर्शी और भावपूर्ण रचना...

कालीपद प्रसाद ने कहा…

भाव, भावना , मुक्तक छंद ,सभी अनूठा है !
सियासत “आप” की !
नई पोस्ट मौसम (शीत काल )

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पीयूष की प्रत्याशा, संभवतः यही जीने का आधार है।