बुधवार, 19 मार्च 2014

धतूरे की टोकरी...

पीता  है   जिसका  दूध
उसे खूंटे से बांध  रखा है  
जो  काट खाता है बे-शर्त
 भय-मुक्त पाल  रखा है  -

बड़ा उदास लौटा है रोजगार
दफ्तर  से ,  बे- रोजगार     
बड़ी उम्मीद ले मंगल व्रत 
का    उपवास   रखा    है-

हर रोज  बांध  आती है 
पीपल से रक्षासूत्र के धागे 
हादसों  के  शहर  में  उसका
बेटा  प्रवास करता है-   

कितना नामाकूल है खुदगर्ज
शाजिसों  का आलिम 
एक स्त्री के लिए आग खंजर 
तेजाब सम्भाल रखा है -

लिखा   तो  है  दुकान   पर 
अनमोल  हीरों का व्यापारी,
धतूरे   की   टोकरी    पर  
रेशमी  रुमाल  डाल रखा है -


                     -    उदय वीर सिंह

5 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

क्या बात है :)

Aditi Poonam ने कहा…

सम सामयिक रचना...आज के हालात का सटीक
चित्रण .....होली की शुभ कामनाएं.....

वाणी गीत ने कहा…

दोहरे चेहरे के लिए धतूरे की टोकरी पर रुमाल का बिम्ब कमाल है !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सचमुच में, बड़ी अजब दुनिया बना रखी है हमने।

ajay yadav ने कहा…

waah ,बहुत खूब
unlimited-potential