गुरुवार, 20 मार्च 2014

आवाज दो














आवाज दो 
अगर देखी है तुमने भूख 
दर्द का बेगानापन 
यतीमी का दौर 
सभ्यता का सूनापन 
तो आवाज दो ....
मनुष्यों ही नहीं 
द्वीपों ,महाद्वीपों का बहरापन 
मनुष्यता का विस्थापन ,
विचारों का बौनापन 
तो आवाज दो .... 
सुना है 
काले गोरे का भेद 
संस्कृतियों का विद्वेष 
निम्न और उच्चता  का सन्देश 
तो आवाज दो ....
अफ्रीका क्या एशिया 
सोमालिया क्या इंडिया   
जीवन ज्वाल ,अस्तित्व मौन क्यों है 
आवाज दो ....
हवा विष दन्त सी 
तेजाबी धूप, घटाओं से अंगार 
पानी मवाद की मानिंद 
अभिशप्त बन गया है 
तो आवाज दो .....
बेबसी दैन्यता  के फैले हाथ 
मांगते ख़ुशी नहीं अपितु जीवन 
मौत भी परायी सी 
अगर इसी ग्रह के प्राणी  हैं
तो आवाज दो ....
सीमा सरहदों आस्था व्यवस्थाओं की 
कैद का कुचक्र कर रहा हो
नैशर्गिक न्याय का वध .
तो आवाज दो ....
आँखों से सुन्दर संसार 
स्वस्थ ,विकसित संसार की 
चाहत है ,
तो आवाज दो ....

                         ---  उदय वीर सिंह     







6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आवाज तो देनी होगी...

Ankur Jain ने कहा…

..सुंदर शब्दों से सजी बेहतरीन प्रस्तुति..होली की शुभकामनाएं



Tushar Raj Rastogi ने कहा…

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - आराधना पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

Anupama Tripathi ने कहा…

आँखों से सुन्दर संसार
स्वस्थ ,विकसित संसार की
चाहत है ,
तो आवाज दो .

सशक्त उद्गार ...!!

रश्मि शर्मा ने कहा…

सुंदर रचना..

बेनामी ने कहा…

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