शुक्रवार, 7 मार्च 2014

अभिव्यक्ति का पर देना -

पीड़ा  के   कातर  पंछी  को 

अभिव्यक्ति  का  पर देना -

न्यून हो धरती का आलय 

 उसे  निखिल अम्बर देना- 


सत्य  -  धरातल   प्राचीरें

प्रायः  उग  जाती  हैं बहुत 

बने  पराधीनता  की कारा 

उससे  पहले  गह्वर देना -


किसी  हृदय   का  अमृत 

बन   उत्सर्जित   हो  विष 

वाहिकाओं  में  उतर चले 

विरोध निज में स्वर देना -


शिखा किसी कौटिल्य की 

खुली रहे आखिर कब तक ,

सृजन हेतु नीहितार्थ नींव 

मजबूत तराशे पत्थर देना-


प्रतिभा  की कोयल, ले आड़ 

विपन्नता आखिर रोये क्यों 

राग -  माधुरी  आकार    वरे 

कूकन  को  अपना  घर देना -

                                 - उदय वीर सिंह

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर !

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 08/03/2014 को "जादू है आवाज में":चर्चा मंच :चर्चा अंक :1545 पर.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आपकी आशाओं को बल मिले..

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut sundar abhivyakti....