शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

आज कोई मौन गाया-


प्रस्तरों  से  गीत  फूटा 
ह्रदय में नव बौर  आया  
मंजरी रस-स्निग्ध होई 
कुञ्ज में एक दौर आया  -

वीथियां  स्तव्ध   दग्ध  
ज्वाल   सी   बयार   से 
कहीं  मलय  के गांव से 
स्नेह का एक ठौर आया -

जा  चुका  ओझल  हुआ 
बस  कल्पना में पास था 
विस्मृत हुई स्मृतियों में 
आज फिर से लौट आया -

हो  अंतहीन   पथ   कहीं 
तब   टूटता   है  धैर्य  भी 
सिले   हुए    अधर  खुले  
आज  कोई   मौन  गाया-

                           -  उदय  वीर सिंह 

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बहुत सुंदर ।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बहुत सुंदर ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (18-04-2014) को "क्या पता था अदब को ही खाओगे" (चर्चा मंच-1586) में अद्यतन लिंक पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति...