रविवार, 27 अप्रैल 2014

गिला नहीं किनारों से -





न भंवर ने  किया कभी रुशवा 
मुझे   गिला  नहीं  किनारों से  -

कुछ  भी माँगा नहीं बहारों से 
फ़ासले ना रहे कभी नजारों से -

काँटों ने  दिया  चुभन हंसकर 
मुझे  गिला   नहीं   दयारों  से -

जब  रकीबों  से हुआ  याराना
मुआफ़ी की  रश्म  है यारों से -

नेजे पे रख दिल नुमाईश न करो 
ना  पाओगे  कहीं   बाजारों  से- 

                           - उदय वीर सिंह 

6 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत खूब !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (28-04-2014) को "मुस्कुराती मदिर मन में मेंहदी" (चर्चा मंच-1596) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

उम्दा........ बेहतरीन !!

मन के - मनके ने कहा…

सुंदर

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

nice .....

dr.mahendrag ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति