रविवार, 20 अप्रैल 2014

वतन आज भी उदास है


ये  कल   भी   उदास  था
वतन आज  भी  उदास है -
कल  दूसरों  के  पास  था
आज  अपनों  के  पास है-
कल अपाहिजों के सिर सजा ताज था
आज   वहशियों   का    आतंकवाद  है
कल  शोलों  का  उजास था
आज   अंधेरों  का  वास  है-
कल  लूटा  गया   अपनों  के  निमंत्रण  पर
तिल तिल कर जीता आज भी षडयन्त्रों पर-
कल जाति का  झंझावात था
आज मजहबों का अधिवास है -
कल रोई थी जोधा दुर्गावती अपनी तकदीर पर
फैसले लिए गए कीमत आबरू और जागीर पर -
कल प्रवंचना  और  प्रलाप  था
आज हारे जुआरी का संताप है -
कल था एकलव्य व द्रोण,संबूक-श्रीराम  का द्वंद
अशहिष्णुता का उद्भव कर्त्तव्य परायणता का अंत-
कल  भोग्या  थी वनवास था
नारी आज अबला है संत्रास है-
कल  भी  वतन  उदास था
आज   भी  वतन  उदास  है -
आत्म - मुग्धता  में जी लेते
अशेष  माजी     परिहास  है -
                      
                             -  उदय वीर सिंह







8 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (21-04-2014) को "गल्तियों से आपके पाठक रूठ जायेंगे" (चर्चा मंच-1589) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया रचना व लेखन , उदय सर धन्यवाद !
नवीन प्रकाशन - घरेलू उपचार ( नुस्खे ) -भाग - ८
बीता प्रकाशन - जिंदगी हँसने गाने के लिए है पल - दो पल !

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह बहुत ख़ूब

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

वाह बहुत ख़ूब

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

मार्मिक विडम्बना देश की वर्तमान दुर्दशा पर .

रश्मि शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना....

dr.mahendrag ने कहा…

यह विडंबना ही है की मुल्क एस लोगों का हाथ पद गया आपकी पीड़ा बहुत वाजिब है.