शुक्रवार, 2 मई 2014

ताश का शहर देखा-


रेत  की   दीवार  का घर देखा 
ताश  के पत्तों का शहर देखा- 

पत्थर घरों में रहने वालों का  
तूफान से बेहिसाब  डर देखा -

सहन में ठूंठ हुए तंगदिली से
घरों  में बनावटी  शजर देखा-

बनाये झूठे  दस्तावेज कितने 
कलम के इर्दगिर्द खंजर देखा -

जो दिल में आया कहा वही उदय 
न   गजल   देखी   न  बहर देखा-

                          -  उदय वीर सिंह 

   

5 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर !

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना शनिवार 03 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Asha Saxena ने कहा…

very nice
Asha

Onkar ने कहा…

सुंदर ग़ज़ल

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन की कहना, कुछ न सहना।