रविवार, 4 मई 2014

मुजरिम हैं पेट के


इन्सानों की जमात में हम हैं, नहीं मालूम
बचपन इतिहास ,किताबें ख्वाब हो गयीं ,
मुजरिम हुए पेट के,अब कचरा ही जिंदगी है -

                                 - उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (05-05-2014) को "मुजरिम हैं पेट के" (चर्चा मंच-1603) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Smart Indian ने कहा…

ओह!