शनिवार, 31 मई 2014

पीर पिघलती है -


आँखों  का  अंजन धुलता है 
जब  पर्वत पीर पिघलती है -
शब्द  मूक  विरमित   होते 
दुर्दिन की घटा जब घिरती है -

पावस - हीन  सरिता  उफनी 
शिखर  -संवेदन   कहती  है -
रिस रिस कर विप्लव आसव  
विक्षोभ  कलश  को भरती है- 

संशय का  प्रतिनिधि  दारुण 
हिय  कोष्ठ प्रबलता कूट भरे 
आरत मन  की भाव निराशा
विष  बूँद- बूँद उर  ढलती है- 
  
पीत  पात  तरुवर तज  जाते  
हरित  पात  की  छाँव  भली  
कोकिल कूक सदा मन मोदित   
पग - पथिक पंथ  को जीती है -

सत्य निषेचन ,प्रखर विवेचन 
संवाद  मौन का  अभिनन्दन 
अनावरण  हो प्रज्ञा  पट  का 
हो  सेतु  हृदय  का  संवेदन-

छूटे अनुबंध ,भरे न भरे पल 
तमस  गीत   का  लोपन हो 
हँसी  कुंज  आलोक मुखर हो 
हो मौन शिखा सादर जलती है-

                  - उदय वीर सिंह   



1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (31-05-2014) को "पीर पिघलती है" (चर्चा मंच-1629) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'