गुरुवार, 3 जुलाई 2014

गिलास में उतर जाता है-



बात आई मानवता की तो धर्म - जाति पर
उतर जाता है -

देश की अस्मिता की बात से जज्जबात पर 
उतर जाता है-

पेशे की आड़ गद्दार की पैरवी में इजलास पर 
उतर जाता है-

सींचता है विषमताओं की ग्रन्थियां,समभाव से 
साफ मुकर जाता है -

किसान व जवान की जवानी का मोल उसकी 
गिलास में उतर जाता है-

अभिशप्त है मजदूर आज भी उसका देखा स्वप्न 
बिखर जाता है -
                                         - उदय वीर सिंह 



2 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (04-07-2014) को "स्वप्न सिमट जाते हैं" {चर्चामंच - 1664} पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'