शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

हमनवा हमदर्द हैं -


नौजवानों हमवतन हम
हमनवा , हमदर्द हैं -
दमवतन की शान हैं हम
हमकदम हमफर्ज हैं -
मेरा मक्का, मदीना मेरा
मेरा काशी , काबा यहीं -
निभाएंगे हम साथ इसका
हाथ मेरे कमजर्फ हैं -
इसकी मिट्टी, पवन, पानी
मेरे जीवन ,मेरे कफ़न -
ये जान भी अहलेवतन की
ना हम कभी खुदगर्ज हैं -

                      -  उदय वीर सिंह

3 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सार्थक प्रस्तुति। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (16-08-2014) को “आजादी की वर्षगाँठ” (चर्चा अंक-1707) पर भी होगी।
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हमारी स्वतन्त्रता और एकता अक्षुण्ण रहे।
स्वतन्त्रता दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

सुंदर रचना