शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

कब तक तूं झूठे फ़साने लिखोगे...


कब  तक   तूं  झूठे  फ़साने  लिखोगे
मोहब्बत  के   झूठे   बहाने  लिखोगे- 

मांगी   दुआ    दर -  दीवारों  से  तेरी  
समझ,नाससमझ तूं दीवाने लिखोगे -

जला जिनका जीवन बचाने में तुमको 
उन्हें  आशिक जूनूनी परवाने लिखोगे -


करोगे   फरेबी  , फरेबों     की    बातें 
कहीं  का  कहीं  तुम ठिकाने लिखोगे -

परिंदों  के  मानिंद  ठहरोगे  तब तक 
जब आएगा पतझड़ कहीं जा बसोगे - 


 उदय वीर सिंह 

                       


9 टिप्‍पणियां:

आशीष भाई ने कहा…

सुंदर रचना व लेखन , सर धन्यवाद !
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सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर ।

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

achhi gazal

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (30-08-2014) को "गणपति वन्दन" (चर्चा मंच 1721) पर भी होगी।
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श्रीगणेश चतुर्थी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

spsingh ने कहा…

बहुत सुंदर रचना।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

Onkar ने कहा…

सुंदर

सु..मन(Suman Kapoor) ने कहा…

सुंदर

dr.mahendrag ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति, अच्छी ग़ज़ल