शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

दिव्य -दृष्टि में घोर अंधरे ....


कब तक रुकते कर में आंसू
जब बह निकले दो नयनों से-
भींगा 
 आँचल  वेदन- बदली 
कब  आश  पूरी  है सपनों से -

जब   चाहा  सावन  के झूले 

फुहारी   ऋतू ,  अंगार  हुयी
दानव -ज्वाल बुझा कब कैसे
बिखरी   ओस   की  बूंदों  से-
मानिंद  कांच,  उर  टुटा  तो
थे   हाथ  पराये , पत्थर  भी
बेड़ी   डूबीं   मजधार    भंवर
पतवारहीन   हो   अपनों  से -
चन्दन -वन  की राह अकेली
विष - दंश  मिलेंगे  ज्ञात रहा
हैं दिव्य -दृष्टि में  घोर अंधरे
गंतव्य  मिला  तो   अंधों  से -

उदय वीर सिंह

4 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर ।

वाणी गीत ने कहा…

गंतव्य मिला अंधेरों से …
जग की यही उलटबांसी !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (13-09-2014) को "सपनों में जी कर क्या होगा " (चर्चा मंच 1735) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Vaanbhatt ने कहा…

सुन्दर रचना...