शनिवार, 20 सितंबर 2014

जरा कम बोलती हैं -


जरा  कम  बोलती हैं -

दरकती  पलों  में , जुबा  खोलती हैं
दिल की  दीवारें  जरा  कम  बोलती हैं -

 भूल जाता जमाना है जख्मों को देकर
दिया कब है किसने, ये नहीं भूलतीं हैं-

यादों  के  घर से  जब  निकली बारातें
दुल्हन  की  डोली  के  पट  खोलती  हैं -

जमाने की आँखों ने जो मंजर दिखाये
भावना की तराजू पर  रख तोलती  हैं  -

- उदय वीर सिंह 



   

    

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (21-09-2014) को "मेरी धरोहर...पेड़" (चर्चा मंच 1743) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

मन के - मनके ने कहा…

सुंदर भाव लिये पंक्तियां.